२७८. महिंसराजजातकं (३-३-८)

८२. किमत्थ [कमत्थ (सी. पी.)] मभिसन्धाय, लहुचित्तस्स दुब्भिनो [दूभिनो (सी. पी.)];

सब्बकामददस्सेव [दुहस्सेव (सी. स्या. पी.), रहस्सेव (क.)], इमं दुक्खं तितिक्खसि.

८३. सिङ्गेन निहनाहेतं, पदसा च अधिट्ठह;

भिय्यो [भीयो (सी.)] बाला पकुज्झेय्युं, नो चस्स पटिसेधको.

८४. ममेवायं मञ्ञमानो, अञ्ञेपेवं [अञ्ञम्पेवं (सी. स्या. पी.)] करिस्सति;

ते नं तत्थ वधिस्सन्ति, सा मे मुत्ति भविस्सतीति.

महिंसराजजातकं [महिसजातकं (सी. स्या. पी.)] अट्ठमं.