५४४. चन्दकुमारजातकं (७)

९८२. ‘‘राजासि लुद्दकम्मो, एकराजा पुप्फवतीया;

सो पुच्छि ब्रह्मबन्धुं, खण्डहालं पुरोहितं मूळ्हं.

९८३. ‘सग्गान मग्गमाचिक्ख [सग्गमग्गमाचिक्ख (सी. पी.)], त्वंसि ब्राह्मण धम्मविनयकुसलो;

यथा इतो वजन्ति सुगतिं, नरा पुञ्ञानि कत्वान’.

९८४. ‘अतिदानं ददित्वान, अवज्झे देव घातेत्वा;

एवं वजन्ति सुगतिं, नरा पुञ्ञानि कत्वान’.

९८५. ‘किं पन तं अतिदानं, के च अवज्झा इमस्मि लोकस्मिं;

एतञ्च खो नो अक्खाहि, यजिस्सामि ददामि [यजिस्साम ददाम (सी. पी.)] दानानि’.

९८६. ‘पुत्तेहि देव यजितब्बं, महेसीहि नेगमेहि च;

उसभेहि आजानियेहि चतूहि, सब्बचतुक्केन देव यजितब्बं’’’.

९८७. ‘‘तं सुत्वा अन्तेपुरे, कुमारा महेसियो च हञ्ञन्तु;

एको अहोसि निग्घोसो, भिस्मा अच्चुग्गतो सद्दो’’.

९८८. ‘‘गच्छथ वदेथ कुमारे, चन्दं सूरियञ्च भद्दसेनञ्च;

सूरञ्च वामगोत्तञ्च, पचुरा [पसुरा (सी. पी. क.)] किर होथ यञ्ञत्थाय.

९८९. ‘‘कुमारियोपि वदेथ, उपसेनं [उपसेनिं (सी.), उपसेणिं (पी.)] कोकिलञ्च मुदितञ्च;

नन्दञ्चापि कुमारिं, पचुरा [पसुरा (सी. पी. क.)] किर होथ यञ्ञत्थाय.

९९०. ‘‘विजयम्पि मय्हं महेसिं, एरावतिं [एकपतिं (पी.), एरापतिं (क.)] केसिनिं सुनन्दञ्च;

लक्खणवरूपपन्ना, पचुरा किर होथ यञ्ञत्थाय.

९९१. ‘‘गहपतयो च वदेथ, पुण्णमुखं भद्दियं सिङ्गालञ्च;

वड्ढञ्चापि गहपतिं, पचुरा किर होथ यञ्ञत्थाय’’.

९९२. ‘‘ते तत्थ गहपतयो, अवोचिसुं समागता पुत्तदारपरिकिण्णा;

सब्बेव सिखिनो देव करोहि, अथ वा नो दासे सावेहि’’.

९९३. ‘‘अभयंकरम्पि मे हत्थिं, नाळागिरिं अच्चुग्गतं वरुणदन्तं [नाळागिरिं अच्चुतं वरुणदन्तं (सी.), राजगिरिं अच्चुतवरुणदन्तं (पी.)];

आनेथ खो ने खिप्पं, यञ्ञत्थाय भविस्सन्ति.

९९४. ‘‘अस्सरतनम्पि [अस्सतरम्पि (सी. पी.), अस्सरतनम्पि मे (स्या.)] केसिं, सुरामुखं पुण्णकं विनतकञ्च;

आनेथ खो ने खिप्पं, यञ्ञत्थाय भविस्सन्ति.

९९५. ‘‘उसभम्पि [उसभम्पि मे (स्या.)] यूथपतिं अनोजं, निसभं गवम्पतिं तेपि मय्हं आनेथ;

समूह [समुपा (सी. पी.), सम्मुखा (स्या.)] करोन्तु सब्बं, यजिस्सामि ददामि दानानि.

९९६. ‘‘सब्बं [सब्बम्पि (स्या.)] पटियादेथ, यञ्ञं पन उग्गतम्हि सूरियम्हि;

आणापेथ च कुमारे [आणापेथ चन्दकुमारे (स्या. क.)], अभिरमन्तु इमं रत्तिं.

९९७. ‘‘सब्बं [सब्बम्पि (स्या.)] उपट्ठपेथ, यञ्ञं पन उग्गतम्हि सूरियम्हि;

वदेथ दानि कुमारे, अज्ज खो [वो (पी.)] पच्छिमा रत्ति’’.

९९८. ‘‘तंतं माता अवच, रोदन्ती आगन्त्वा विमानतो;

यञ्ञो किर ते पुत्त, भविस्सति चतूहि पुत्तेहि’’.

९९९. ‘‘सब्बेपि मय्हं पुत्ता चत्ता, चन्दस्मिं हञ्ञमानस्मिं;

पुत्तेहि यञ्ञं यजित्वान, सुगतिं सग्गं गमिस्सामि’’.

१०००. ‘‘मा तं [मा (सी. पी.)] पुत्त सद्दहेसि, सुगति किर होति पुत्तयञ्ञेन;

निरयानेसो मग्गो, नेसो मग्गो हि सग्गानं.

१००१. ‘‘दानानि देहि कोण्डञ्ञ, अहिंसा सब्बभूतभब्यानं’’;

एस मग्गो सुगतिया, न च मग्गो पुत्तयञ्ञेन’’.

१००२. ‘‘आचरियानं वचना, घातेस्सं चन्दञ्च सूरियञ्च;

पुत्तेहि यञ्ञं [पुत्तेहि (सी. स्या. पी.)] यजित्वान दुच्चजेहि, सुगतिं सग्गं गमिस्सामि’’.

१००३. ‘‘तंतं पितापि अवच, वसवत्ती ओरसं सकं पुत्तं;

यञ्ञो किर ते पुत्त, भविस्सति चतूहि पुत्तेहि’’.

१००४. ‘‘सब्बेपि मय्हं पुत्ता चत्ता, चन्दस्मिं हञ्ञमानस्मिं;

पुत्तेहि यञ्ञं यजित्वान, सुगतिं सग्गं गमिस्सामि’’.

१००५. ‘‘मा तं पुत्त सद्दहेसि, सुगति किर होति पुत्तयञ्ञेन;

निरयानेसो मग्गो, नेसो मग्गो हि सग्गानं.

१००६. ‘‘दानानि देहि कोण्डञ्ञ, अहिंसा सब्बभूतभब्यानं;

एस मग्गो सुगतिया, न च मग्गो पुत्तयञ्ञेन’’.

१००७. ‘‘आचरियानं वचना, घातेस्सं चन्दञ्च सूरियञ्च;

पुत्तेहि यञ्ञं यजित्वान दुच्चजेहि, सुगतिं सग्गं गमिस्सामि’’.

१००८. ‘‘दानानि देहि कोण्डञ्ञ, अहिंसा सब्बभूतभब्यानं;

पुत्तपरिवुतो तुवं, रट्ठं जनपदञ्च पालेहि’’.

१००९. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

अपि निगळबन्धकापि, हत्थी अस्से च पालेम.

१०१०. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

अपि निगळबन्धकापि, हत्थिछकणानि उज्झेम.

१०११. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

अपि निगळबन्धकापि, अस्सछकणानि उज्झेम.

१०१२. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स [इदं पदं सी. पी. पोत्थकेसु नत्थि];

यस्स होन्ति तव कामा, अपि रट्ठा पब्बाजिता;

भिक्खाचरियं चरिस्साम’’.

१०१३. ‘‘दुक्खं खो मे जनयथ, विलपन्ता जीवितस्स कामा हि;

मुञ्चेथ [मुञ्चथ (सी. पी.)] दानि कुमारे, अलम्पि मे होतु पुत्तयञ्ञेन’’.

१०१४. ‘‘पुब्बेव खोसि मे वुत्तो, दुक्करं दुरभिसम्भवञ्चेतं;

अथ नो उपक्खटस्स यञ्ञस्स, कस्मा करोसि विक्खेपं.

१०१५. ‘‘सब्बे वजन्ति सुगतिं, ये यजन्ति येपि याजेन्ति;

ये चापि अनुमोदन्ति, यजन्तानं एदिसं महायञ्ञं’’.

१०१६. ‘‘अथ किस्स जनो [च नो (सी. स्या. पी.)] पुब्बे, सोत्थानं ब्राह्मणे अवाचेसि;

अथ नो अकारणस्मा, यञ्ञत्थाय देव घातेसि.

१०१७. ‘‘पुब्बेव नो दहरकाले [दहरके समाने (सी. पी.)], न हनेसि [न मारेसि (सी. पी.)] न घातेसि;

दहरम्हा योब्बनं पत्ता, अदूसका तात हञ्ञाम.

१०१८. ‘‘हत्थिगते अस्सगते, सन्नद्धे पस्स नो महाराज;

युद्धे वा युज्झमाने वा, न हि मादिसा सूरा होन्ति यञ्ञत्थाय.

१०१९. ‘‘पच्चन्ते वापि कुपिते, अटवीसु वा मादिसे नियोजेन्ति;

अथ नो अकारणस्मा, अभूमियं तात हञ्ञाम.

१०२०. ‘‘यापि हि ता सकुणियो, वसन्ति तिणघरानि कत्वान;

तासम्पि पिया पुत्ता, अथ नो त्वं देव घातेसि.

१०२१. ‘‘मा तस्स सद्दहेसि, न मं खण्डहालो घातेय्य;

ममञ्हि सो घातेत्वान, अनन्तरा तम्पि देव घातेय्य.

१०२२. ‘‘गामवरं निगमवरं ददन्ति, भोगम्पिस्स महाराज;

अथग्गपिण्डिकापि, कुले कुले हेते भुञ्जन्ति.

१०२३. ‘‘तेसम्पि तादिसानं, इच्छन्ति दुब्भितुं महाराज;

येभुय्येन एते, अकतञ्ञुनो ब्राह्मणा देव.

१०२४. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

अपि निगळबन्धकापि, हत्थी अस्से च पालेम.

१०२५. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

अपि निगळबन्धकापि, हत्थिछकणानि उज्झेम.

१०२६. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

अपि निगळबन्धकापि, अस्सछकणानि उज्झेम.

१०२७. ‘‘मा नो देव अवधि, दासे नो देहि खण्डहालस्स;

यस्स होन्ति तव कामा, अपि रट्ठा पब्बाजिता;

भिक्खाचरियं चरिस्साम’’.

१०२८. ‘‘दुक्खं खो मे जनयथ, विलपन्ता जीवितस्स कामा हि;

मुञ्चेथ दानि कुमारे, अलम्पि मे होतु पुत्तयञ्ञेन’’.

१०२९. ‘‘पुब्बेव खोसि मे वुत्तो, दुक्करं दुरभिसम्भवञ्चेतं;

अथ नो उपक्खटस्स यञ्ञस्स, कस्मा करोसि विक्खेपं.

१०३०. ‘‘सब्बे वजन्ति सुगतिं, ये यजन्ति येपि याजेन्ति;

ये चापि अनुमोदन्ति, यजन्तानं एदिसं महायञ्ञं’’.

१०३१. ‘‘यदि किर यजित्वा पुत्तेहि, देवलोकं इतो चुता यन्ति;

ब्राह्मणो ताव यजतु, पच्छापि यजसि तुवं राजा.

१०३२. ‘‘यदि किर यजित्वा पुत्तेहि, देवलोकं इतो चुता यन्ति;

एस्वेव खण्डहालो, यजतं सकेहि पुत्तेहि.

१०३३. ‘‘एवं जानन्तो खण्डहालो, किं पुत्तके न घातेसि;

सब्बञ्च ञातिजनं, अत्तानञ्च न घातेसि.

१०३४. ‘‘सब्बे वजन्ति निरयं, ये यजन्ति येपि याजेन्ति;

ये चापि अनुमोदन्ति, यजन्तानं एदिसं महायञ्ञं.

१०३५. [अयं गाथा सी. स्या. पी. पोत्थकेसु न दिस्सति] ‘‘सचे हि सो सुज्झति यो हनाति, हतोपि सो सग्गमुपेति ठानं;

भोवादि भोवादिन मारयेय्युं, ये चापि तेसं अभिसद्दहेय्युं’’ [अयं गाथा सी. स्या. पी. पोत्थकेसु न दिस्सति].

१०३६. ‘‘कथञ्च किर पुत्तकामायो, गहपतयो घरणियो च;

नगरम्हि न उपरवन्ति राजानं, मा घातयि ओरसं पुत्तं.

१०३७. ‘‘कथञ्च किर पुत्तकामायो, गहपतयो घरणियो च;

नगरम्हि न उपरवन्ति राजानं, मा घातयि अत्रजं पुत्तं.

१०३८. ‘‘रञ्ञो चम्हि अत्थकामो, हितो च सब्बजनपदस्स [सब्बदा जनपदस्स (सी. पी.)];

न कोचि अस्स पटिघं, मया जानपदो न पवेदेति’’.

१०३९. ‘‘गच्छथ वो घरणियो, तातञ्च वदेथ खण्डहालञ्च;

मा घातेथ कुमारे, अदूसके सीहसङ्कासे.

१०४०. ‘‘गच्छथ वो घरणियो, तातञ्च वदेथ खण्डहालञ्च;

मा घातेथ कुमारे, अपेक्खिते सब्बलोकस्स’’.

१०४१. ‘‘यं नूनाहं जायेय्यं, रथकारकुलेसु वा;

पुक्कुसकुलेसु वा वेस्सेसु वा जायेय्यं;

न हज्ज मं राज यञ्ञे [यञ्ञत्थाय (सी. पी.)] घातेय्य’’.

१०४२. ‘‘सब्बा सीमन्तिनियो गच्छथ, अय्यस्स खण्डहालस्स;

पादेसु निपतथ, अपराधाहं न पस्सामि.

१०४३. ‘‘सब्बा सीमन्तिनियो गच्छथ, अय्यस्स खण्डहालस्स;

पादेसु निपतथ, किन्ते भन्ते मयं अदूसेम’’.

१०४४. ‘‘कपणा [कपणं (सी. पी.)] विलपति सेला, दिस्वान भातरे [भातरो (सी. स्या. पी. क.)] उपनीतत्ते;

यञ्ञो किर मे उक्खिपितो, तातेन सग्गकामेन’’.

१०४५. ‘‘आवत्ति परिवत्ति च, वसुलो सम्मुखा रञ्ञो;

मा नो पितरं अवधि, दहरम्हा योब्बनं पत्ता’’.

१०४६. ‘‘एसो ते वसुल पिता, समेहि पितरा सह;

दुक्खं खो मे जनयसि, विलपन्तो अन्तेपुरस्मिं;

मुञ्चेथ दानि कुमारे, अलम्पि मे होतु पुत्तयञ्ञेन’’.

१०४७. ‘‘पुब्बेव खोसि मे वुत्तो, दुक्करं दुरभिसम्भवञ्चेतं;

अथ नो उपक्खटस्स यञ्ञस्स, कस्मा करोसि विक्खेपं.

१०४८. ‘‘सब्बे वजन्ति सुगतिं, ये यजन्ति येपि याजेन्ति;

ये चापि अनुमोदन्ति, यजन्तानं एदिसं महायञ्ञं’’.

१०४९. ‘‘सब्बरतनस्स यञ्ञो उपक्खटो, एकराज तव पटियत्तो;

अभिनिक्खमस्सु देव, सग्गं गतो त्वं पमोदिस्ससि’’.

१०५०. ‘‘दहरा सत्तसता एता, चन्दकुमारस्स भरियायो;

केसे पकिरित्वान [परिकिरित्वान (सी. पी.), विकिरित्वान (स्या. क.)], रोदन्तियो मग्गमनुयायिंसु [मग्गमनुयन्ति (सी. पी.), मग्गमनुयायन्ति (स्या.)].

१०५१. ‘‘अपरा पन सोकेन, निक्खन्ता नन्दने विय देवा;

केसे पकिरित्वान [परिकिरित्वान (सी. पी.), विकिरित्वान (स्या. क.)], रोदन्तियो मग्गमनुयायिंसु’’ [मग्गमनुयन्ति (सी. पी.), मग्गमनुयायन्ति (स्या.)].

१०५२. ‘‘कासिकसुचिवत्थधरा, कुण्डलिनो अगलुचन्दनविलित्ता;

निय्यन्ति चन्दसूरिया, यञ्ञत्थाय एकराजस्स.

१०५३. ‘‘कासिकसुचिवत्थधरा, कुण्डलिनो अगलुचन्दनविलित्ता;

निय्यन्ति चन्दसूरिया, मातु कत्वा हदयसोकं.

१०५४. ‘‘कासिकसुचिवत्थधरा, कुण्डलिनो अगलुचन्दनविलित्ता;