४७५. फन्दनजातकं (२)

१४. कुठारिहत्थो [कुधारिहत्थो (क.)] पुरिसो, वनमोगय्ह तिट्ठसि;

पुट्ठो मे सम्म अक्खाहि, किं दारुं छेतुमिच्छसि.

१५. इस्सो [इसो (सी.), ईसो (स्या. पी.)] वनानि चरसि, समानि विसमानि च;

पुट्ठो मे सम्म अक्खाहि, किं दारुं नेमिया दळ्हं.

१६. नेव सालो न खदिरो, नास्सकण्णो कुतो धवो;

रुक्खो च [रुक्खोव (सी. पी.)] फन्दनो नाम, तं दारुं नेमिया दळ्हं.

१७. कीदिसानिस्स पत्तानि, खन्धो वा पन कीदिसो;

पुट्ठो मे सम्म अक्खाहि, यथा जानेमु फन्दनं.

१८. यस्स साखा पलम्बन्ति, नमन्ति न च भञ्जरे;

सो रुक्खो फन्दनो नाम, यस्स मूले अहं ठितो.

१९. अरानं चक्कनाभीनं, ईसानेमिरथस्स च;

सब्बस्स ते कम्मनियो, अयं हेस्सति फन्दनो.

२०. इति फन्दनरुक्खोपि, तावदे अज्झभासथ;

मय्हम्पि वचनं अत्थि, भारद्वाज सुणोहि मे.

२१. इस्सस्स [इमस्स (क. सी. क.)] उपक्खन्धम्हा [उपखन्धम्हा (क. सी. पी. क.)], उक्कच्च चतुरङ्गुलं;

तेन नेमिं पसारेसि [परिहरेसि (सी. पी.)], एवं दळ्हतरं सिया.

२२. इति फन्दनरुक्खोपि, वेरं अप्पेसि तावदे;

जातानञ्च अजातानं, इस्सानं दुक्खमावहि.

२३. इच्चेवं [इच्चेव (सी. पी.)] फन्दनो इस्सं, इस्सो च पन फन्दनं;

अञ्ञमञ्ञं विवादेन, अञ्ञमञ्ञमघातयुं.

२४. एवमेव मनुस्सानं, विवादो यत्थ जायति;

मयूरनच्चं नच्चन्ति, यथा ते इस्सफन्दना.

२५. तं वो वदामि भद्दं वो [भद्दन्ते (क.)], यावन्तेत्थ समागता;

सम्मोदथ मा विवदथ [माविवदित्थ (सी. स्या. पी.)], मा होथ इस्सफन्दना.

२६. सामग्गिमेव [सामग्यमेव (स्या. क.)] सिक्खेथ, बुद्धेहेतं पसंसितं;

सामग्गिरतो धम्मट्ठो, योगक्खेमा न धंसतीति.

फन्दनजातकं दुतियं.