४. चतुत्थवग्गो

(३९) ७. लक्खणकथा

४००. लक्खणसमन्नागतो बोधिसत्तोति? आमन्ता. पदेसलक्खणेहि समन्नागतो पदेसबोधिसत्तोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

लक्खणसमन्नागतो बोधिसत्तोति? आमन्ता. तिभागलक्खणेहि समन्नागतो तिभागबोधिसत्तोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

लक्खणसमन्नागतो बोधिसत्तोति? आमन्ता. उपड्ढलक्खणेहि समन्नागतो उपड्ढबोधिसत्तोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

लक्खणसमन्नागतो बोधिसत्तोति? आमन्ता. चक्कवत्तिसत्तो लक्खणसमन्नागतो, चक्कवत्तिसत्तो बोधिसत्तोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

चक्कवत्तिसत्तो लक्खणसमन्नागतो, चक्कवत्तिसत्तो बोधिसत्तोति? आमन्ता. यादिसो बोधिसत्तस्स पुब्बयोगो पुब्बचरिया धम्मक्खानं धम्मदेसना, तादिसो चक्कवत्तिसत्तस्स पुब्बयोगो पुब्बचरिया धम्मक्खानं धम्मदेसनाति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

४०१. यथा बोधिसत्तस्स जायमानस्स देवा पठमं पटिग्गण्हन्ति पच्छा मनुस्सा [दी. नि. २.२७; म. नि. ३.२०५ वुत्तं दिस्साय पुच्छति], एवमेवं चक्कवत्तिसत्तस्स जायमानस्स देवा पठमं पटिग्गण्हन्ति पच्छा मनुस्साति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

यथा बोधिसत्तस्स जायमानस्स चत्तारो नं देवपुत्ता पटिग्गहेत्वा मातु पुरतो ठपेन्ति – ‘‘अत्तमना, देवि, होहि! महेसक्खो ते पुत्तो उप्पन्नो’’ति, एवमेवं चक्कवत्तिसत्तस्स जायमानस्स चत्तारो नं देवपुत्ता पटिग्गहेत्वा मातु पुरतो ठपेन्ति – ‘‘अत्तमना, देवि, होहि! महेसक्खो ते पुत्तो उप्पन्नो’’ति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

यथा बोधिसत्तस्स जायमानस्स द्वे उदकस्स धारा अन्तलिक्खा पातुभवन्ति – एका सीतस्स, एका उण्हस्स – येन बोधिसत्तस्स उदककिच्चं करोन्ति मातु च, एवमेवं चक्कवत्तिसत्तस्स जायमानस्स द्वे उदकस्स धारा अन्तलिक्खा पातुभवन्ति – एका सीतस्स, एका उण्हस्स – येन चक्कवत्तिसत्तस्स उदककिच्चं करोन्ति मातु चाति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

यथा सम्पतिजातो बोधिसत्तो समेहि पादेहि पतिट्ठहित्वा उत्तरेन अभिमुखो सत्तपदवीतिहारेन गच्छति सेतम्हि छत्ते अनुधारियमाने, सब्बा च दिसा विलोकेति, आसभिञ्च वाचं भासति – ‘‘अग्गोहमस्मि लोकस्स, जेट्ठोहमस्मि लोकस्स, सेट्ठोहमस्मि लोकस्स, अयमन्तिमा जाति, नत्थि दानि पुनब्भवो’’ति, एवमेवं सम्पतिजातो चक्कवत्तिसत्तो समेहि पादेहि पतिट्ठहित्वा उत्तरेन अभिमुखो सत्तपदवीतिहारेन गच्छति सेतम्हि छत्ते अनुधारियमाने, सब्बा च दिसा विलोकेति, आसभिञ्च वाचं भासति – ‘‘अग्गोहमस्मि लोकस्स, जेट्ठोहमस्मि लोकस्स, सेट्ठोहमस्मि लोकस्स, अयमन्तिमा जाति, नत्थि दानि पुनब्भवो’’ति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

यथा बोधिसत्तस्स जायमानस्स महतो आलोकस्स महतो ओभासस्स महतो भूमिचालस्स पातुभावो होति, एवमेवं चक्कवत्तिसत्तस्स जायमानस्स महतो आलोकस्स महतो ओभासस्स महतो भूमिचालस्स पातुभावो होतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

यथा बोधिसत्तस्स पकतिकायो समन्ता ब्यामं ओभासति, एवमेवं चक्कवत्तिसत्तस्स पकतिकायो समन्ता ब्यामं ओभासतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

यथा बोधिसत्तो महासुपिनं पस्सति, एवमेवं चक्कवत्तिसत्तो महासुपिनं पस्सतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

४०२. न वत्तब्बं – ‘‘लक्खणसमन्नागतो बोधिसत्तो’’ति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘द्वत्तिंसिमानि, भिक्खवे, महापुरिसस्स महापुरिसलक्खणानि, येहि समन्नागतस्स महापुरिसस्स द्वेव गतियो भवन्ति अनञ्ञा [न अञ्ञा (क.)]! सचे अगारं अज्झावसति, राजा होति चक्कवत्ती धम्मिको धम्मराजा चातुरन्तो विजितावी जनपदत्थावरियप्पत्तो सत्तरतनसमन्नागतो. तस्सिमानि सत्त रतनानि भवन्ति, सेय्यथिदं – चक्करतनं, हत्थिरतनं, अस्सरतनं, मणिरतनं, इत्थिरतनं, गहपतिरतनं, परिणायकरतनमेव सत्तमं. परोसहस्सं खो पनस्स पुत्ता भवन्ति सूरा वीरङ्गरूपा परसेनप्पमद्दना. सो इमं पथविं सागरपरियन्तं अदण्डेन असत्थेन धम्मेन अभिविजिय अज्झावसति. सचे खो पन अगारस्मा अनगारियं पब्बजति, अरहं होति सम्मासम्बुद्धो लोके विवट्टच्छदो’’ति [दी. नि. ३.२००]. अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि लक्खणसमन्नागतो बोधिसत्तोति.

लक्खणकथा निट्ठिता.