४. चतुत्थवग्गो
(४०) ८. नियामोक्कन्तिकथा
४०३. बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियोति [म. नि. २.२८२ घटिकारसुत्तं निस्साय पुच्छति]? आमन्ता. बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो सावकोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो सावकोति? आमन्ता. सावको हुत्वा बुद्धो होतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
सावको हुत्वा बुद्धो होतीति? आमन्ता. अनुस्सवियोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
अनुस्सवियोति? आमन्ता. ननु भगवा सयम्भूति? आमन्ता. हञ्चि भगवा सयम्भू, नो च वत रे वत्तब्बे – ‘‘अनुस्सवियो’’ति.
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियोति? आमन्ता. भगवता बोधिया मूले तीणेव सामञ्ञफलानि अभिसम्बुद्धानीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
ननु भगवता बोधिया मूले चत्तारि सामञ्ञफलानि अभिसम्बुद्धानीति? आमन्ता. हञ्चि भगवता बोधिया मूले चत्तारि सामञ्ञफलानि अभिसम्बुद्धानि, नो च वत रे वत्तब्बे – ‘‘बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो’’ति.
४०४. बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियोति? आमन्ता. बोधिसत्तो दुक्करकारियं अकासीति? आमन्ता. दस्सनसम्पन्नो पुग्गलो दुक्करकारियं करेय्याति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
बोधिसत्तो अपरन्तपं [अमरं तपं (सं. नि. १.१३७)] अकासि, अञ्ञं सत्थारं उद्दिसीति? आमन्ता. दस्सनसम्पन्नो पुग्गलो अञ्ञं सत्थारं उद्दिसेय्याति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
आयस्मा आनन्दो भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, आयस्मा आनन्दो भगवतो सावकोति? आमन्ता. बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो सावकोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
चित्तो गहपति हत्थको आळवको भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, चित्तो गहपति हत्थको आळवको भगवतो सावकोति? आमन्ता. बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो सावकोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, न च कस्सपस्स भगवतो सावकोति? आमन्ता. आयस्मा आनन्दो भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, न च भगवतो सावकोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, न च कस्सपस्स भगवतो सावकोति? आमन्ता. चित्तो गहपति हत्थको आळवको भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, न च भगवतो सावकोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो, न च कस्सपस्स भगवतो सावकोति? आमन्ता. सावको जातिं वीतिवत्तो असावको होतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
४०५. न वत्तब्बं – ‘‘बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो’’ति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘कस्सपे अहं, आनन्द, भगवति ब्रह्मचरियं अचरिं आयतिं सम्बोधाया’’ति! अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो’’ति.
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियोति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता –
‘‘सब्बाभिभू सब्बविदूहमस्मि,
सब्बेसु धम्मेसु अनुपलित्तो;
सब्बञ्जहो तण्हक्खये विमुत्तो,
सयं अभिञ्ञाय कमुद्दिसेय्यं.
‘‘न मे आचरियो अत्थि, सदिसो मे न विज्जति;
सदेवकस्मिं लोकस्मिं, नत्थि मे पटिपुग्गलो.
‘‘अहञ्हि अरहा लोके, अहं सत्था अनुत्तरो;
एकोम्हि सम्मासम्बुद्धो, सीतिभूतोस्मि निब्बुतो.
‘‘धम्मचक्कं पवत्तेतुं, गच्छामि कासिनं पुरं;
अन्धीभूतस्मिं [अन्धभूतस्मिं (सी. स्या. कं. पी.)] लोकस्मिं, आहञ्छं [आहञ्ञिं (क.)] अमतदुन्दुभि’’न्ति [दुद्रभिन्ति (क.)].
‘‘यथा खो त्वं, आवुसो, पटिजानासि, अरहसि अनन्तजिनो’’ति?
‘‘मादिसा वे जिना होन्ति, ये पत्ता आसवक्खयं;
जिता मे पापका धम्मा, तस्माहं उपक जिनो’’ति [महाव. ११; म. नि. १.२८५; २.३४१].
अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो’’ति.
बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियोति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘‘इदं दुक्खं अरियसच्च’न्ति मे, भिक्खवे, पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु चक्खुं उदपादि, ञाणं उदपादि, पञ्ञा उदपादि, विज्जा उदपादि, आलोको उदपादि. ‘तं खो पनिदं दुक्खं अरियसच्चं परिञ्ञेय्य’न्ति मे, भिक्खवे…पे… परिञ्ञातन्ति मे, भिक्खवे, पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु चक्खुं उदपादि…पे… आलोको उदपादि. ‘इदं दुक्खसमुदयं अरियसच्च’न्ति मे, भिक्खवे…पे… ‘तं खो पनिदं दुक्खसमुदयं [दुक्खसमुदयो (स्या. कं.)] अरियसच्चं पहातब्ब’न्ति मे, भिक्खवे…पे… पहीनन्ति मे, भिक्खवे…पे… ‘इदं दुक्खनिरोधं [दुक्खनिरोधो (स्या. कं.)] अरियसच्च’न्ति मे, भिक्खवे…पे… ‘तं खो पनिदं दुक्खनिरोधं अरियसच्चं सच्छिकातब्ब’न्ति मे, भिक्खवे…पे… सच्छिकतन्ति मे, भिक्खवे…पे… ‘इदं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा अरियसच्च’न्ति मे, भिक्खवे…पे… ‘तं खो पनिदं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा अरियसच्चं भावेतब्ब’न्ति मे, भिक्खवे…पे… भावितन्ति मे, भिक्खवे, पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु चक्खुं उदपादि, ञाणं उदपादि, पञ्ञा उदपादि, विज्जा उदपादि, आलोको उदपादी’’ति [महाव. १५; सं. नि. ५.१०८१; पटि. म. २.३०]. अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘बोधिसत्तो कस्सपस्स भगवतो पावचने ओक्कन्तनियामो चरितब्रह्मचरियो’’ति.
नियामोक्कन्तिकथा निट्ठिता.