८. निसभत्थेरगाथा

१९५. ‘‘पञ्च कामगुणे हित्वा, पियरूपे मनोरमे;

सद्धाय घरा निक्खम्म, दुक्खस्सन्तकरो भवे.

१९६. ‘‘नाभिनन्दामि मरणं, नाभिनन्दामि जीवितं;

कालञ्च पटिकङ्खामि, सम्पजानो पतिस्सतो’’ति.

… निसभो थेरो….