५. सुनागत्थेरगाथा

८५. ‘‘चित्तनिमित्तस्स कोविदो, पविवेकरसं विजानिय;

झायं निपको पतिस्सतो, अधिगच्छेय्य सुखं निरामिस’’न्ति.

… सुनागो थेरो….