१२. द्वादसमवग्गो

१. जेन्तत्थेरगाथा

१११. ‘‘दुप्पब्बज्जं वे दुरधिवासा गेहा, धम्मो गम्भीरो दुरधिगमा भोगा;

किच्छा वुत्ति नो इतरीतरेनेव, युत्तं चिन्तेतुं सततमनिच्चत’’न्ति.

… जेन्तो थेरो….

२. वच्छगोत्तत्थेरगाथा

११२. ‘‘तेविज्जोहं महाझायी, चेतोसमथकोविदो;

सदत्थो मे अनुप्पत्तो, कतं बुद्धस्स सासन’’न्ति.

… वच्छगोत्तो थेरो….

३. वनवच्छत्थेरगाथा

११३. ‘‘अच्छोदिका पुथुसिला,गोनङ्गुलमिगायुता;

अम्बुसेवालसञ्छन्ना, ते सेला रमयन्ति म’’न्ति.

… वनवच्छो थेरो….

४. अधिमुत्तत्थेरगाथा

११४. ‘‘कायदुट्ठुल्लगरुनो, हिय्यमानम्हि [हीयमानम्हि (सी.)] जीविते;

सरीरसुखगिद्धस्स, कुतो समणसाधुता’’ति.

… अधिमुत्तो थेरो….

५. महानामत्थेरगाथा

११५. ‘‘एसावहिय्यसे पब्बतेन, बहुकुटजसल्लकिकेन [सल्लकितेन (सी.), सल्लरिकेन (स्या.)];

नेसादकेन गिरिना, यसस्सिना परिच्छदेना’’ति.

… महानामो थेरो….

६. पारापरियत्थेरगाथा

११६. ‘‘छफस्सायतने हित्वा, गुत्तद्वारो सुसंवुतो;

अघमूलं वमित्वान, पत्तो मे आसवक्खयो’’ति.

… पारापरियो [पारासरियो (सी.), पारंपरियो (क.)] थेरो ….

७. यसत्थेरगाथा

११७. ‘‘सुविलित्तो सुवसनो,सब्बाभरणभूसितो;

तिस्सो विज्जा अज्झगमिं, कतं बुद्धस्स सासन’’न्ति.

… यसो थेरो….

८. किमिलत्थेरगाथा

११८. ‘‘अभिसत्तोव निपतति, वयो रूपं अञ्ञमिव तथेव सन्तं;

तस्सेव सतो अविप्पवसतो, अञ्ञस्सेव सरामि अत्तान’’न्ति.

… किमिलो [किम्बिलो (सी. स्या.)] थेरो….

९. वज्जिपुत्तत्थेरगाथा

११९. ‘‘रुक्खमूलगहनं पसक्किय, निब्बानं हदयस्मिं ओपिय;

झाय गोतम मा च पमादो, किं ते बिळिबिळिका करिस्सती’’ति.

… वज्जिपुत्तो थेरो….

१०. इसिदत्तत्थेरगाथा

१२०. ‘‘पञ्चक्खन्धा परिञ्ञाता, तिट्ठन्ति छिन्नमूलका;

दुक्खक्खयो अनुप्पत्तो,पत्तो मे आसवक्खयो’’ति.

… इसिदत्तो थेरो….

वग्गो द्वादसमो निट्ठितो.

तस्सुद्दानं –

जेन्तो च वच्छगोत्तो च, वच्छो च वनसव्हयो;

अधिमुत्तो महानामो, पारापरियो यसोपि च;

किमिलो वज्जिपुत्तो च, इसिदत्तो महायसोति.

एककनिपातो निट्ठितो.