२. विजयत्थेरगाथा
९२. ‘‘यस्सासवा परिक्खीणा, आहारे च अनिस्सितो;
सुञ्ञता अनिमित्तो च, विमोक्खो यस्स गोचरो;
आकासेव सकुन्तानं, पदं तस्स दुरन्नय’’न्ति.
… विजयो थेरो….
९२. ‘‘यस्सासवा परिक्खीणा, आहारे च अनिस्सितो;
सुञ्ञता अनिमित्तो च, विमोक्खो यस्स गोचरो;
आकासेव सकुन्तानं, पदं तस्स दुरन्नय’’न्ति.
… विजयो थेरो….