७. नन्दमाणवपुच्छा

१०८३. ‘‘सन्ति लोके मुनयो, (इच्चायस्मा नन्दो)

जना वदन्ति तयिदं कथंसु;

ञाणूपपन्नं नो मुनिं [मुनि नो (स्या. क.)] वदन्ति, उदाहु वे जीवितेनूपपन्नं’’.

१०८४. ‘‘न दिट्ठिया न सुतिया न ञाणेन, (न सीलब्बतेन) [( ) नत्थि सी.-पी पोत्थकेसु]

मुनीध नन्द कुसला वदन्ति;

विसेनिकत्वा अनीघा निरासा, चरन्ति ये ते मुनयोति ब्रूमि’’.

१०८५. ‘‘ये केचिमे समणब्राह्मणासे, (इच्चायस्मा नन्दो)

दिट्ठस्सुतेनापि [दिट्ठेन सुतेनापि (सी.), दिट्ठे सुतेनापि (स्या. पी. क.)] वदन्ति सुद्धिं;

सीलब्बतेनापि वदन्ति सुद्धिं, अनेकरूपेन वदन्ति सुद्धिं;

कच्चिस्सु ते भगवा तत्थ यता चरन्ता, अतारु जातिञ्च जरञ्च मारिस;

पुच्छामि तं भगवा ब्रूहि मे तं’’.

१०८६. ‘‘ये केचिमे समणब्राह्मणासे, (नन्दाति भगवा)

दिट्ठस्सुतेनापि वदन्ति सुद्धिं;

सीलब्बतेनापि वदन्ति सुद्धिं, अनेकरूपेन वदन्ति सुद्धिं;

किञ्चापि ते तत्थ यता चरन्ति, नारिंसु जातिजरन्ति ब्रूमि’’.

१०८७. ‘‘ये केचिमे समणब्राह्मणासे, (इच्चायस्मा नन्दो)

दिट्ठस्सुतेनापि वदन्ति सुद्धिं;

सीलब्बतेनापि वदन्ति सुद्धिं, अनेकरूपेन वदन्ति सुद्धिं;

ते चे मुनि [सचे मुनि (सी.)] ब्रूसि अनोघतिण्णे, अथ को चरहि देवमनुस्सलोके;

अतारि जातिञ्च जरञ्च मारिस, पुच्छामि तं भगवा ब्रूहि मे तं’’.

१०८८. ‘‘नाहं सब्बे समणब्राह्मणासे, (नन्दाति भगवा)

जातिजराय निवुताति ब्रूमि;

ये सीध दिट्ठंव सुतं मुतं वा, सीलब्बतं वापि पहाय सब्बं;

अनेकरूपम्पि पहाय सब्बं, तण्हं परिञ्ञाय अनासवासे;

ते वे नरा ओघतिण्णाति ब्रूमि’’.

१०८९. ‘‘एताभिनन्दामि वचो महेसिनो, सुकित्तितं गोतमनूपधीकं;

ये सीध दिट्ठं व सुतं मुतं वा, सीलब्बतं वापि पहाय सब्बं;

अनेकरूपम्पि पहाय सब्बं, तण्हं परिञ्ञाय अनासवासे;

अहम्पि ते ओघतिण्णाति ब्रूमी’’ति.

नन्दमाणवपुच्छा सत्तमा निट्ठिता.