६. पराभवसुत्तं
एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. अथ खो अञ्ञतरा देवता अभिक्कन्ताय रत्तिया अभिक्कन्तवण्णा केवलकप्पं जेतवनं ओभासेत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्ठासि. एकमन्तं ठिता खो सा देवता भगवन्तं गाथाय अज्झभासि –
९१. ‘‘पराभवन्तं पुरिसं, मयं पुच्छाम गोतम [गोतमं (सी. स्या.)];
भगवन्तं [भवन्तं (स्या. क.)] पुट्ठुमागम्म, किं पराभवतो मुखं’’.
९२. ‘‘सुविजानो भवं होति, सुविजानो [दुविजानो (स्या. क.)] पराभवो;
धम्मकामो भवं होति, धम्मदेस्सी पराभवो’’.
९३. ‘‘इति हेतं विजानाम, पठमो सो पराभवो;
दुतियं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
९४. ‘‘असन्तस्स पिया होन्ति, सन्ते न कुरुते पियं;
असतं धम्मं रोचेति, तं पराभवतो मुखं’’.
९५. ‘‘इति हेतं विजानाम, दुतियो सो पराभवो;
ततियं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
९६. ‘‘निद्दासीली सभासीली, अनुट्ठाता च यो नरो;
अलसो कोधपञ्ञाणो, तं पराभवतो मुखं’’.
९७. ‘‘इति हेतं विजानाम, ततियो सो पराभवो;
चतुत्थं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
९८. ‘‘यो मातरं [यो मातरं वा (सी. स्या. कं. पी.)] पितरं वा, जिण्णकं गतयोब्बनं;
पहु सन्तो न भरति, तं पराभवतो मुखं’’.
९९. ‘‘इति हेतं विजानाम, चतुत्थो सो पराभवो;
पञ्चमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
१००. ‘‘यो ब्राह्मणं [यो ब्राह्मणं वा (सी. स्या. कं. पी.)] समणं वा, अञ्ञं वापि वनिब्बकं;
मुसावादेन वञ्चेति, तं पराभवतो मुखं’’.
१०१. ‘‘इति हेतं विजानाम, पञ्चमो सो पराभवो;
छट्ठमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
१०२. ‘‘पहूतवित्तो पुरिसो, सहिरञ्ञो सभोजनो;
एको भुञ्जति सादूनि, तं पराभवतो मुखं’’.
१०३. ‘‘इति हेतं विजानाम, छट्ठमो सो पराभवो;
सत्तमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
१०४. ‘‘जातित्थद्धो धनत्थद्धो, गोत्तत्थद्धो च यो नरो;
सञ्ञातिं अतिमञ्ञेति, तं पराभवतो मुखं’’.
१०५. ‘‘इति हेतं विजानाम, सत्तमो सो पराभवो;
अट्ठमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
१०६. ‘‘इत्थिधुत्तो सुराधुत्तो, अक्खधुत्तो च यो नरो;
लद्धं लद्धं विनासेति, तं पराभवतो मुखं’’.
१०७. ‘‘इति हेतं विजानाम, अट्ठमो सो पराभवो;
नवमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
१०८. ‘‘सेहि दारेहि असन्तुट्ठो [दारेह्यसन्तुट्ठो (क.)], वेसियासु पदुस्सति [पदिस्सति (सी.)];
दुस्सति [दिस्सति (सी. पी.)] परदारेसु, तं पराभवतो मुखं’’.
१०९. ‘‘इति हेतं विजानाम, नवमो सो पराभवो;
दसमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
११०. ‘‘अतीतयोब्बनो पोसो, आनेति तिम्बरुत्थनिं;
तस्सा इस्सा न सुपति, तं पराभवतो मुखं’’.
१११. ‘‘इति हेतं विजानाम, दसमो सो पराभवो;
एकादसमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
११२. ‘‘इत्थिं सोण्डिं विकिरणिं, पुरिसं वापि तादिसं;
इस्सरियस्मिं ठपेति [ठापेति (सी. पी.), थपेति (क.)], तं पराभवतो मुखं’’.
११३. ‘‘इति हेतं विजानाम, एकादसमो सो पराभवो;
द्वादसमं भगवा ब्रूहि, किं पराभवतो मुखं’’.
११४. ‘‘अप्पभोगो महातण्हो, खत्तिये जायते कुले;
सो च रज्जं पत्थयति, तं पराभवतो मुखं’’.
११५. ‘‘एते पराभवे लोके, पण्डितो समवेक्खिय;
अरियो दस्सनसम्पन्नो, स लोकं भजते सिव’’न्ति.
पराभवसुत्तं छट्ठं निट्ठितं.