७. नन्दमाणवपुच्छा

१०२. ‘‘सन्ति लोके मुनयो, [इच्चायस्मा नन्दो]

जना वदन्ति तयिदं कथंसु;

ञाणूपपन्नं मुनि नो वदन्ति, उदाहु वे जीवितेनूपपन्नं’’.

१०३. ‘‘न दिट्ठिया न सुतिया न ञाणेन, मुनीध नन्द कुसला वदन्ति;

विसेनिकत्वा अनीघा निरासा, चरन्ति ये ते मुनयोति ब्रूमि’’.

१०४. ‘‘ये केचिमे समणब्राह्मणासे, [इच्चायस्मा नन्दो]

दिट्ठस्सुतेनापि वदन्ति सुद्धिं;

सीलब्बतेनापि वदन्ति सुद्धिं,

अनेकरूपेन वदन्ति सुद्धिं;

कच्चिस्सु ते भगवा तत्थ यता चरन्ता,

अतारु जातिञ्च जरञ्च मारिस;

पुच्छामि तं भगवा ब्रूहि मेतं’’.

१०५. ‘‘ये केचिमे समणब्राह्मणासे, [नन्दाति भगवा]

दिट्ठस्सुतेनापि वदन्ति सुद्धिं;

सीलब्बतेनापि वदन्ति सुद्धिं, अनेकरूपेन वदन्ति सुद्धिं;

किञ्चापि ते तत्थ यता चरन्ति, नातरिंसु जातिजरन्ति ब्रूमि’’.

१०६. ‘‘ये केचिमे समणब्राह्मणासे, [इच्चायस्मा नन्दो]

दिट्ठस्सुतेनापि वदन्ति सुद्धिं;

सीलब्बतेनापि वदन्ति सुद्धिं, अनेकरूपेन वदन्ति सुद्धिं;

ते चे मुनि ब्रूसि अनोघतिण्णे, अथ को चरहि देवमनुस्सलोके;

अतारि जातिञ्च जरञ्च मारिस, पुच्छामि तं भगवा ब्रूहि मेतं’’.

१०७. ‘‘नाहं सब्बे समणब्राह्मणासे, [नन्दाति भगवा]

जातिजराय निवुताति ब्रूमि;

ये सीध दिट्ठं व सुतं मुतं वा, सीलब्बतं वापि पहाय सब्बं;

अनेकरूपम्पि पहाय सब्बं, तण्हं परिञ्ञाय अनासवासे;

ते वे नरा ओघतिण्णाति ब्रूमि’’.

१०८. ‘‘एताभिनन्दामि वचो महेसिनो, सुकित्तितं गोतमनूपधीकं;

ये सीध दिट्ठं व सुतं मुतं वा, सीलब्बतं वापि पहाय सब्बं;

अनेकरूपम्पि पहाय सब्बं, तण्हं परिञ्ञाय अनासवासे;

अहम्पि ते ओघतिण्णाति ब्रूमी’’ति.

नन्दमाणवपुच्छा सत्तमा.