३९८. सुतनुजातकं (७-१-३)
१५. राजा ते भत्तं पाहेसि, सुचिं मंसूपसेचनं;
मघदेवस्मिं [मखादेवस्मिं (सी. पी.), माघदेवस्मिं (क.)] अधिवत्थे, एहि निक्खम्म भुञ्जस्सु.
१६. एहि माणव ओरेन, भिक्खमादाय सूपितं;
त्वञ्च माणव भिक्खा च [भक्खोसि (स्या.), भक्खाव (क.)], उभो भक्खा भविस्सथ.
१७. अप्पकेन तुवं यक्ख, थुल्लमत्थं जहिस्ससि;
भिक्खं ते नाहरिस्सन्ति, जना मरणसञ्ञिनो.
१८. लद्धाय यक्खा [लद्धायं यक्ख (सी. स्या. पी.)] तव निच्चभिक्खं, सुचिं पणीतं रससा उपेतं;
भिक्खञ्च ते आहरियो नरो इध, सुदुल्लभो हेहिति भक्खिते [खादिते (सी. स्या. पी.)] मयि.
१९. ममेव [ममेस (सी. पी.)] सुतनो अत्थो, यथा भाससि माणव;
मया त्वं समनुञ्ञातो, सोत्थिं पस्साहि मातरं.
२०. खग्गं छत्तञ्च पातिञ्च, गच्छमादाय [गच्छेवादाय (सी. स्या. पी.)] माणव;
सोत्थिं पस्सतु ते माता, त्वञ्च पस्साहि मातरं.
२१. एवं यक्ख सुखी होहि, सह सब्बेहि ञातिभि;
धनञ्च मे अधिगतं, रञ्ञो च वचनं कतन्ति.
सुतनुजातकं ततियं.