५३२. सोणनन्दजातकं (२)
९२. ‘‘देवता नुसि गन्धब्बो, अदु [आदु (सी. स्या.)] सक्को पुरिन्ददो;
मनुस्सभूतो इद्धिमा, कथं जानेमु तं मयं’’.
९३. ‘‘नापि देवो न गन्धब्बो, नापि सक्को पुरिन्ददो;
मनुस्सभूतो इद्धिमा, एवं जानाहि भारध’’ [भारभ (क.)].
९४. ‘‘कतरूपमिदं भोतो [भोतो (सी. पी.)], वेय्यावच्चं अनप्पकं;
देवम्हि वस्समानम्हि, अनोवस्सं भवं अका.
९५. ‘‘ततो वातातपे घोरे, सीतच्छायं भवं अका;
ततो अमित्तमज्झेसु [अमित्तमज्झे च (सी.)], सरताणं भवं अका.
९६. ‘‘ततो फीतानि रट्ठानि, वसिनो ते भवं अका;
ततो एकसतं खत्ये, अनुयन्ते [अनुयुत्ते (पी.)] भवं अका.
९७. ‘‘पतीतास्सु मयं भोतो, वद तं [वर तं (सी. स्या. पी.)] भञ्ज [भञ्ञ (सी. पी.), भुञ्ज (स्या. क.)] मिच्छसि;
हत्थियानं अस्सरथं, नारियो च अलङ्कता;
निवेसनानि रम्मानि, मयं भोतो ददामसे.
९८. ‘‘अथ वङ्गे [अथ वा सङ्गे (सी. पी.)] वा मगधे, मयं भोतो ददामसे;
अथ वा अस्सकावन्ती [अस्सकावन्तिं (सी. स्या. पी.)], सुमना दम्म ते मयं.
९९. ‘‘उपड्ढं वापि रज्जस्स, मयं भोतो ददामसे;
सचे ते अत्थो रज्जेन, अनुसास यदिच्छसि’’.
१००. ‘‘न मे अत्थोपि रज्जेन, नगरेन धनेन वा;
अथोपि जनपदेन, अत्थो मय्हं न विज्जति.
१०१. ‘‘भोतोव रट्ठे विजिते, अरञ्ञे अत्थि अस्समो;
पिता मय्हं जनेत्ती च, उभो सम्मन्ति अस्समे.
१०२. ‘‘तेसाहं [तेस्वहं (क.)] पुब्बाचरियेसु, पुञ्ञं न लभामि कातवे;
भवन्तं अज्झावरं कत्वा, सोणं [सोनं (पी.)] याचेमु संवरं’’.
१०३. ‘‘करोमि ते तं वचनं, यं मं भणसि ब्राह्मण;
एतञ्च खो नो अक्खाहि, कीवन्तो होन्तु याचका’’.
१०४. ‘‘परोसतं जानपदा, महासाला च ब्राह्मणा;
इमे च खत्तिया सब्बे, अभिजाता यसस्सिनो;
भवञ्च राजा मनोजो, अलं हेस्सन्ति याचका’’.
१०५. ‘‘हत्थी अस्से च योजेन्तु, रथं सन्नय्ह सारथि [नं रथि (पी.)];
आबन्धनानि गण्हाथ, पादासुस्सारयद्धजे [पादेसुस्सारयं धजे (सी.), पादासुस्सारयं धजे (पी.)];
अस्समं तं गमिस्सामि, यत्थ सम्मति कोसियो’’.
१०६. ‘‘ततो च राजा पायासि, सेनाय चतुरङ्गिनी;
अगमा अस्समं रम्मं, यत्थ सम्मति कोसियो’’.
१०७. ‘‘कस्स कादम्बयो [कस्स कादम्बमयो (क.)] काजो, वेहासं चतुरङ्गुलं;
अंसं असम्फुसं एति, उदहाराय [उदहारस्स (सी. स्या. पी.)] गच्छतो’’.
१०८. ‘‘अहं सोणो महाराज, तापसो सहितब्बतो [सहितं वतो (पी.)];
भरामि मातापितरो, रत्तिन्दिवमतन्दितो.
१०९. ‘‘वने फलञ्च मूलञ्च, आहरित्वा दिसम्पति;
पोसेमि मातापितरो, पुब्बे कतमनुस्सरं’’.
११०. ‘‘इच्छाम अस्समं गन्तुं, यत्थ सम्मति कोसियो;
मग्गं नो सोण अक्खाहि, येन गच्छेमु [गच्छाम (सी.)] अस्समं’’.
१११. ‘‘अयं एकपदी राज, येनेतं [येन तं (क.)] मेघसन्निभं;
कोविळारेहि सञ्छन्नं, एत्थ सम्मति कोसियो’’.
११२. ‘‘इदं वत्वान पक्कामि, तरमानो महाइसि;
वेहासे अन्तलिक्खस्मिं, अनुसासित्वान खत्तिये.
११३. ‘‘अस्समं परिमज्जित्वा, पञ्ञपेत्वान [पञ्ञपेत्वान (सी. स्या.)] आसनं;
पण्णसालं पविसित्वा, पितरं पटिबोधयि.
११४. ‘‘इमे आयन्ति राजानो, अभिजाता यसस्सिनो;
अस्समा निक्खमित्वान, निसीद त्वं [निसीदाहि (सी.)] महाइसे.
११५. ‘‘तस्स तं वचनं सुत्वा, तरमानो महाइसि;
अस्समा निक्खमित्वान, सद्वारम्हि उपाविसि’’.
११६. ‘‘तञ्च दिस्वान आयन्तं, जलन्तंरिव तेजसा;
खत्यसङ्घपरिब्यूळ्हं, कोसियो एतदब्रवि.
११७. ‘‘कस्स भेरी मुदिङ्गा च [मुतिङ्गा च (पी.)], सङ्खा पणवदिन्दिमा [देण्डिमा (सी. पी.)];
पुरतो पटिपन्नानि, हासयन्ता रथेसभं.
११८. ‘‘कस्स कञ्चनपट्टेन, पुथुना विज्जुवण्णिना;
युवा कलापसन्नद्धो, को एति सिरिया जलं.
११९. ‘‘उक्कामुखपहट्ठंव, खदिरङ्गारसन्निभं;
मुखञ्च रुचिरा भाति, को एति सिरिया जलं.
१२०. ‘‘कस्स पग्गहितं छत्तं, ससलाकं मनोरमं;
आदिच्चरंसावरणं, को एति सिरिया जलं.
१२१. ‘‘कस्स अङ्गं परिग्गय्ह, वाळबीजनिमुत्तमं;
चरन्ति वरपुञ्ञस्स [वरपञ्ञस्स (सी. पी.)], हत्थिक्खन्धेन आयतो.
१२२. ‘‘कस्स सेतानि छत्तानि, आजानीया च वम्मिता;
समन्ता परिकिरेन्ति [परिकिरन्ति (सी. स्या. पी.)], को एति सिरिया जलं.
१२३. ‘‘कस्स एकसतं खत्या, अनुयन्ता [अनुयुत्ता (पी.)] यसस्सिनो;
समन्तानुपरियन्ति, को एति सिरिया जलं.
१२४. ‘‘हत्थि अस्सरथ पत्ति [हत्थी अस्सा रथा पत्ती (सी.)], सेना च चतुरङ्गिनी;
समन्तानुपरियन्ति [समन्ता अनुपरियाति (पी.)], को एति सिरिया जलं.
१२५. ‘‘कस्सेसा महती सेना, पिट्ठितो अनुवत्तति;
अक्खोभणी [अक्खाभनी (सी.), अक्खोभिनी (स्या.)] अपरियन्ता, सागरस्सेव ऊमियो’’.
१२६. ‘‘राजाभिराजा [राजाधिराजा (क.)] मनोजो, इन्दोव जयतं पति;
नन्दस्सज्झावरं एति, अस्समं ब्रह्मचारिनं.
१२७. ‘‘तस्सेसा महती सेना, पिट्ठितो अनुवत्तति;
अक्खोभणी अपरियन्ता, सागरस्सेव ऊमियो’’.
१२८. ‘‘अनुलित्ता चन्दनेन, कासिकुत्तमधारिनो [कासिकवत्थधारिनो (पी.)];
सब्बे पञ्जलिका हुत्वा, इसीनं अज्झुपागमुं’’.
१२९. ‘‘कच्चि नु भोतो कुसलं, कच्चि भोतो अनामयं;
कच्चि उञ्छेन यापेथ, कच्चि मूलफला बहू.
१३०. ‘‘कच्चि डंसा मकसा च, अप्पमेव सरीसपा [सिरिंसपा (सी. स्या. पी.)];
वने वाळमिगाकिण्णे, कच्चि हिंसा न विज्जति’’.
१३१. ‘‘कुसलञ्चेव नो राज, अथो राज अनामयं;
अथो उञ्छेन यापेम, अथो मूलफला बहू.
१३२. ‘‘अथो डंसा मकसा च [डंसा च मकसा (सी.), डंसा च मकसा च (पी.)], अप्पमेव सरीसपा [सिरिंसपा (सी. स्या. पी.)];
वने वाळमिगाकिण्णे, हिंसा मय्हं [अ म्हं (सी. पी.)] न विज्जति.
१३३. ‘‘बहूनि वस्सपूगानि, अस्समे सम्मतं [वसतो (सी.)] इध;
नाभिजानामि उप्पन्नं, आबाधं अमनोरमं.
१३४. ‘‘स्वागतं ते महाराज, अथो ते अदुरागतं;
इस्सरोसि अनुप्पत्तो, यं इधत्थि पवेदय.
१३५. ‘‘तिन्दुकानि पियालानि, मधुके कासुमारियो [कासमारियो (सी. स्या.)];
फलानि खुद्दकप्पानि, भुञ्ज राज वरं वरं.
१३६. ‘‘इदम्पि पानीयं सीतं, आभतं गिरिगब्भरा;
ततो पिव महाराज, सचे त्वं अभिकङ्खसि’’.
१३७. ‘‘पटिग्गहितं यं दिन्नं, सब्बस्स अग्घियं कतं;
नन्दस्सापि निसामेथ, वचनं सो [यं (सी.), यं सो (पी.)] पवक्खति.
१३८. ‘‘अज्झावरम्हा नन्दस्स, भोतो सन्तिकमागता;
सुणातु [सुणातु मे (सी. स्या.)] भवं वचनं, नन्दस्स परिसाय च’’.
१३९. ‘‘परोसतं जानपदा [जनपदा (पी.)], महासाला च ब्राह्मणा;
इमे च खत्तिया सब्बे, अभिजाता यसस्सिनो;
भवञ्च राजा मनोजो, अनुमञ्ञन्तु मे वचो.
१४०. ‘‘ये च सन्ति [ये वसन्ति (सी.), ये हि सन्ति (पी.)] समीतारो, यक्खानि इध मस्समे;
अरञ्ञे भूतभब्यानि, सुणन्तु वचनं मम.
१४१. ‘‘नमो कत्वान भूतानं, इसिं वक्खामि सुब्बतं;
सो त्याहं दक्खिणा बाहु, तव कोसिय सम्मतो.
१४२. ‘‘पितरं मे जनेत्तिञ्च, भत्तुकामस्स मे सतो;
वीर पुञ्ञमिदं ठानं, मा मं कोसिय वारय.
१४३. ‘‘सब्भि हेतं उपञ्ञातं, ममेतं उपनिस्सज;
उट्ठानपारिचरियाय, दीघरत्तं तया कतं;
मातापितूसु पुञ्ञानि, मम लोकददो भव.
१४४. ‘‘तथेव सन्ति मनुजा, धम्मे धम्मपदं विदू;
मग्गो सग्गस्स लोकस्स, यथा जानासि त्वं इसे.
१४५. ‘‘उट्ठानपारिचरियाय, मातापितुसुखावहं;
तं मं पुञ्ञा निवारेति, अरियमग्गावरो नरो’’.
१४६. ‘‘सुणन्तु भोन्तो वचनं, भातुरज्झावरा मम;
कुलवंसं महाराज, पोराणं परिहापयं;
अधम्मचारी जेट्ठेसु [यो जेट्ठो (सी.)], निरयं सोपपज्जति [सो उपपज्जति (सी. स्या. पी.)].
१४७. ‘‘ये च धम्मस्स कुसला, पोराणस्स दिसम्पति;
चारित्तेन च सम्पन्ना, न ते गच्छन्ति दुग्गतिं.
१४८. ‘‘मातापिता च भाता च, भगिनी ञातिबन्धवा;
सब्बे जेट्ठस्स ते भारा, एवं जानाहि भारध [भारथ (स्या.)].
१४९. ‘‘आदियित्वा गरुं भारं, नाविको विय उस्सहे;
धम्मञ्च नप्पमज्जामि, जेट्ठो चस्मि रथेसभ’’.
१५०. ‘‘अधिगमा [अधिगतम्हा (सी.), अधिगम्हा (स्या.), अधिगतम्ह (पी.)] तमे ञाणं, जालंव जातवेदतो;
एवमेव नो भवं धम्मं, कोसियो पविदंसयि.
१५१. ‘‘यथा उदयमादिच्चो, वासुदेवो पभङ्करो;
पाणीनं पविदंसेति, रूपं कल्याणपापकं;
एवमेव नो भवं धम्मं, कोसियो पविदंसयि’’.
१५२. ‘‘एवं मे याचमानस्स, अञ्जलिं नावबुज्झथ;
तव पद्धचरो [तव पट्ठचरो (स्या.), तव बद्धञ्चरो (पी.), तवुपट्ठचरो (क.)] हेस्सं, वुट्ठितो परिचारको’’.
१५३. ‘‘अद्धा नन्द विजानासि [पजानासि (सी.)], सद्धम्मं सब्भि देसितं;
अरियो अरियसमाचारो, बाळ्हं त्वं मम रुच्चसि.
१५४. ‘‘भवन्तं वदामि भोतिञ्च, सुणाथ वचनं मम;
नायं भारो भारमतो [भारमत्तो (सी. स्या.)], अहु मय्हं कुदाचनं.
१५५. ‘‘तं मं उपट्ठितं सन्तं, मातापितुसुखावहं;
नन्दो अज्झावरं कत्वा, उपट्ठानाय याचति.
१५६. ‘‘यो वे इच्छति कामेन, सन्तानं ब्रह्मचारिनं;
नन्दं वो वरथ एको [नन्दं वदथ एके (पी.)], कं नन्दो उपतिट्ठतु’’.
१५७. ‘‘तया तात अनुञ्ञाता, सोण तं निस्सिता मयं;
उपघातुं [उपघायितुं (सी.)] लभे नन्दं, मुद्धनि ब्रह्मचारिनं’’.
१५८. ‘‘अस्सत्थस्सेव तरुणं, पवाळं मालुतेरितं;
चिरस्सं नन्दं दिस्वान, हदयं मे पवेधति.
१५९. ‘‘यदा सुत्तापि सुपिने [सुप्पन्ते (स्या. पी.)], नन्दं पस्सामि आगतं;
उदग्गा सुमना होमि, नन्दो नो आगतो अयं.
१६०. ‘‘यदा च पटिबुज्झित्वा, नन्दं पस्सामि नागतं;
भिय्यो आविसती सोको, दोमनस्सञ्चनप्पकं.
१६१. ‘‘साहं अज्ज चिरस्सम्पि, नन्दं पस्सामि आगतं;
भत्तुच्च [भत्तुञ्च (क.)] मय्हञ्च पियो, नन्दो नो पाविसी घरं.
१६२. ‘‘पितुपि नन्दो सुप्पियो, यं नन्दो नप्पवसे [पाविसी (पी.)] घरा [घरं (स्या. पी. क.)];
लभतू तात नन्दो तं, मं नन्दो उपतिट्ठतु’’.