(६) अट्ठ पुरिसदोसा

९५७. तत्थ कतमे अट्ठ पुरिसदोसा? (क) इध भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो [चोदियमानो (सी. स्या.) अ. नि. ८.१४] ‘‘न सरामि न सरामी’’ति अस्सतियाव निब्बेठेति. अयं पठमो पुरिसदोसो.

(ख) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो चोदकंयेव पटिप्फरति – ‘‘किं नु खो तुय्हं बालस्स अब्यत्तस्स भणितेन! त्वम्पि नाम मं भणितब्बं मञ्ञसी’’ति! अयं दुतियो पुरिसदोसो.

(ग) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो चोदकंयेव [चोदकस्सेव (स्या.) अ. नि. ८.१४] पच्चारोपेति – ‘‘त्वम्पि खोसि इत्थन्नामं आपत्तिं आपन्नो. त्वं ताव पठमं पटिकरोही’’ति. अयं ततियो पुरिसदोसो.

(घ) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो अञ्ञेनाञ्ञं पटिचरति, बहिद्धा कथं अपनामेति, कोपञ्च दोसञ्च अप्पच्चयञ्च पातुकरोति. अयं चतुत्थो पुरिसदोसो.

(ङ) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो सङ्घमज्झे बाहाविक्खेपकं भणति. अयं पञ्चमो पुरिसदोसो.

(च) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो अनादियित्वा सङ्घं, अनादियित्वा चोदकं, सापत्तिकोव [आपत्तिकोव (क.) अ. नि. ८.१४] येनकामं पक्कमति. अयं छट्ठो पुरिसदोसो.

(छ) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो ‘‘नेवाहं आपन्नोम्हि, न पनाहं अनापन्नोम्ही’’ति तुण्हीभूतो सङ्घं विहेसेति. अयं सत्तमो पुरिसदोसो.

(ज) पुन चपरं भिक्खू भिक्खुं आपत्तिया चोदेन्ति. सो भिक्खु भिक्खूहि आपत्तिया चोदियमानो एवमाह – ‘‘किं नु खो तुम्हे आयस्मन्तो अतिबाळ्हं मयि ब्यावटा. इदानाहं सिक्खं पच्चक्खाय हीनायावत्तिस्सामी’’ति. सो सिक्खं पच्चक्खाय हीनायावत्तित्वा एवमाह – ‘‘इदानि खो तुम्हे आयस्मन्तो अत्तमना होथा’’ति. अयं अट्ठमो पुरिसदोसो. इमे अट्ठ पुरिसदोसा.