(३७) ५. उपेक्खासमन्नागतकथा

३९७. अरहा छहि उपेक्खाहि समन्नागतोति? आमन्ता. अरहा छहि फस्सेहि, छहि वेदनाहि, छहि सञ्ञाहि…पे… छहि पञ्ञाहि समन्नागतोति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

अरहा छहि उपेक्खाहि समन्नागतोति? आमन्ता. अरहा चक्खुना रूपं पस्सन्तो सोतेन सद्दं सुणाति, घानेन गन्धं घायति, जिव्हाय रसं सायति, कायेन फोट्ठब्बं फुसति, मनसा धम्मं विजानाति…पे… मनसा धम्मं विजानन्तो चक्खुना रूपं पस्सति, सोतेन सद्दं सुणाति, घानेन गन्धं घायति, जिव्हाय रसं सायति, कायेन फोट्ठब्बं फुसतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

अरहा छहि उपेक्खाहि समन्नागतोति? आमन्ता. सततं समितं अब्बोकिण्णं छहि उपेक्खाहि समन्नागतो समोहितो [समाहितो (स्या.)], छ उपेक्खायो पच्चुपट्ठिताति? न हेवं वत्तब्बे…पे….

न वत्तब्बं – ‘‘अरहा छहि उपेक्खाहि समन्नागतो’’ति? आमन्ता. ननु अरहा छळङ्गुपेक्खोति? आमन्ता. हञ्चि अरहा छळङ्गुपेक्खो, तेन वत रे वत्तब्बे – ‘‘अरहा छहि उपेक्खाहि समन्नागतो’’ति…पे….

उपेक्खासमन्नागतकथा निट्ठिता.