२. दुतियवग्गो

(१७) ८. कुक्कुळकथा

३३८. सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळाति? आमन्ता. ननु अत्थि सुखा वेदना, कायिकं सुखं, चेतसिकं सुखं, दिब्बं सुखं, मानुसकं सुखं, लाभसुखं, सक्कारसुखं, यानसुखं, सयनसुखं, इस्सरियसुखं, आधिपच्चसुखं, गिहिसुखं, सामञ्ञसुखं, सासवं सुखं, अनासवं सुखं, उपधिसुखं, निरूपधिसुखं, सामिसं सुखं, निरामिसं सुखं, सप्पीतिकं सुखं, निप्पीतिकं सुखं, झानसुखं, विमुत्तिसुखं, कामसुखं, नेक्खम्मसुखं, विवेकसुखं, उपसमसुखं, सम्बोधसुखन्ति? आमन्ता. हञ्चि अत्थि सुखा वेदना…पे… सम्बोधसुखं, नो च वत रे वत्तब्बे – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळाति? आमन्ता. सब्बे सङ्खारा दुक्खा वेदना कायिकं दुक्खं चेतसिकं दुक्खं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सउपायासाति? न हेवं वत्तब्बे.

न वत्तब्बं – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘सब्बं, भिक्खवे, आदित्तं! किञ्च, भिक्खवे, सब्बं आदित्तं? चक्खुं, भिक्खवे, आदित्तं, रूपा आदित्ता, चक्खुविञ्ञाणं आदित्तं, चक्खुसम्फस्सो आदित्तो; यमिदं [यम्पिदं (सं. नि. ४.२८)] चक्खुसम्फस्सपच्चया उप्पज्जति वेदयितं सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, तम्पि आदित्तं. केन आदित्तं? ‘रागग्गिना दोसग्गिना मोहग्गिना आदित्तं, जातिया जराय मरणेन सोकेहि परिदेवेहि दुक्खेहि दोमनस्सेहि उपायासेहि आदित्त’न्ति वदामि. सोतं आदित्तं, सद्दा आदित्ता…पे… घानं आदित्तं, गन्धा आदित्ता…पे… जिव्हा आदित्ता, रसा आदित्ता…पे… कायो आदित्तो, फोट्ठब्बा आदित्ता…पे… मनो आदित्तो, धम्मा आदित्ता, मनोविञ्ञाणं आदित्तं, मनोसम्फस्सो आदित्तो; यमिदं मनोसम्फस्सपच्चया उप्पज्जति वेदयितं सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, तम्पि आदित्तं. केन आदित्तं? ‘रागग्गिना दोसग्गिना मोहग्गिना आदित्तं, जातिया जराय मरणेन सोकेहि परिदेवेहि दुक्खेहि दोमनस्सेहि उपायासेहि आदित्त’न्ति वदामी’’ति [महाव. ५४; सं. नि. ४.२८]. अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि वत्तब्बं [तेन हि (सी. स्या.), तेन हि न वत्तब्बं (क.)] – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळाति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘पञ्चिमे, भिक्खवे, कामगुणा! कतमे पञ्च? चक्खुविञ्ञेय्या रूपा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया, सोतविञ्ञेय्या सद्दा…पे… घानविञ्ञेय्या गन्धा… जिव्हाविञ्ञेय्या रसा… कायविञ्ञेय्या फोट्ठब्बा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया. इमे खो, भिक्खवे, पञ्च कामगुणा’’ति [म. नि. १.१६६; सं. नि. ४.२६८]. अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

न वत्तब्बं – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘लाभा वो, भिक्खवे, सुलद्धं वो, भिक्खवे, खणो वो पटिलद्धो [पटिविद्धो (बहूसु)] ब्रह्मचरियवासाय! दिट्ठा मया, भिक्खवे, छ फस्सायतनिका नाम निरया. तत्थ यं किञ्चि चक्खुना रूपं पस्सति, अनिट्ठरूपञ्ञेव पस्सति नो इट्ठरूपं, अकन्तरूपञ्ञेव पस्सति नो कन्तरूपं, अमनापरूपञ्ञेव पस्सति नो मनापरूपं. यं किञ्चि सोतेन सद्दं सुणाति…पे… घानेन गन्धं घायति… जिव्हाय रसं सायति… कायेन फोट्ठब्बं फुसति… मनसा धम्मं विजानाति, अनिट्ठरूपञ्ञेव विजानाति नो इट्ठरूपं, अकन्तरूपञ्ञेव विजानाति नो कन्तरूपं, अमनापरूपञ्ञेव विजानाति नो मनापरूप’’न्ति [सं. नि. ४.१३५]. अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि वत्तब्बं [तेन हि न वत्तब्बं (स्या. क.)] – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळाति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता – ‘‘लाभा वो, भिक्खवे, सुलद्धं वो, भिक्खवे, खणो वो पटिलद्धो ब्रह्मचरियवासाय! दिट्ठा मया, भिक्खवे, छ फस्सायतनिका नाम सग्गा. तत्थ यं किञ्चि चक्खुना रूपं पस्सति, इट्ठरूपञ्ञेव पस्सति नो अनिट्ठरूपं, कन्तरूपञ्ञेव पस्सति नो अकन्तरूपं, मनापरूपञ्ञेव पस्सति नो अमनापरूपं. यं किञ्चि सोतेन सद्दं सुणाति…पे… घानेन गन्धं घायति… जिव्हाय रसं सायति… कायेन फोट्ठब्बं फुसति… मनसा धम्मं विजानाति, इट्ठरूपञ्ञेव विजानाति नो अनिट्ठरूपं, कन्तरूपञ्ञेव विजानाति नो अकन्तरूपं, मनापरूपञ्ञेव विजानाति नो अमनापरूप’’न्ति [सं. नि. ४.१३५]. अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

न वत्तब्बं – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति? आमन्ता. ननु ‘‘यदनिच्चं तं दुक्खं [सं. नि. ३.१५],’’ वुत्तं भगवता, ‘‘सब्बे सङ्खारा अनिच्चा’’ति [ध. प. २७७; म. नि. १.३५६]? आमन्ता. हञ्चि ‘‘यदनिच्चं तं दुक्खं,’’ वुत्तं भगवता, ‘‘सब्बे सङ्खारा अनिच्चा,’’ तेन वत रे वत्तब्बे – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळाति? आमन्ता. दानं अनिट्ठफलं अकन्तफलं अमनुञ्ञफलं सेचनकफलं दुक्खुद्रयं दुक्खविपाकन्ति? न हेवं वत्तब्बे.

सीलं…पे… उपोसथो…पे… भावना…पे… ब्रह्मचरियं अनिट्ठफलं अकन्तफलं अमनुञ्ञफलं सेचनकफलं दुक्खुद्रयं दुक्खविपाकन्ति? न हेवं वत्तब्बे.

ननु दानं इट्ठफलं कन्तफलं मनुञ्ञफलं असेचनकफलं सुखुद्रयं सुखविपाकन्ति? आमन्ता. हञ्चि दानं इट्ठफलं कन्तफलं मनुञ्ञफलं असेचनकफलं सुखुद्रयं सुखविपाकं, नो च वत रे वत्तब्बे – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

ननु सीलं… उपोसथो… भावना… ब्रह्मचरियं इट्ठफलं कन्तफलं मनुञ्ञफलं असेचनकफलं सुखुद्रयं सुखविपाकन्ति? आमन्ता. हञ्चि ब्रह्मचरियं इट्ठफलं कन्तफलं मनुञ्ञफलं असेचनकफलं सुखुद्रयं सुखविपाकन्ति, नो च वत रे वत्तब्बे – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळाति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता –

‘‘सुखो विवेको तुट्ठस्स, सुतधम्मस्स पस्सतो;

अब्यापज्जं सुखं लोके, पाणभूतेसु संयमो.

‘‘सुखा विरागता लोके, कामानं समतिक्कमो;

अस्मिमानस्स यो विनयो, एतं वे परमं सुखं [महाव. ५; उदा. ११ उदाने च].

‘‘तं सुखेन सुखं पत्तं, अच्चन्तसुखमेव तं;

तिस्सो विज्जा अनुप्पत्ता, एतं वे परमं सुख’’न्ति.

अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘सब्बे सङ्खारा अनोधिं कत्वा कुक्कुळा’’ति.

कुक्कुळकथा निट्ठिता.