१४२. थुल्लच्चयवत्थुकादि
२३८. इध पन, भिक्खवे, भिक्खु तदहु पवारणाय थुल्लच्चयं अज्झापन्नो होति. एकच्चे भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू सङ्घादिसेसदिट्ठिनो होन्ति. ये ते, भिक्खवे, भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो, तेहि सो, भिक्खवे, भिक्खु एकमन्तं अपनेत्वा यथाधम्मं कारापेत्वा सङ्घं उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘‘यं खो सो, आवुसो, भिक्खु आपत्तिं आपन्नो, सास्स यथाधम्मं पटिकता. यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, सङ्घो पवारेय्या’’ति.
इध पन, भिक्खवे, भिक्खु तदहु पवारणाय थुल्लच्चयं अज्झापन्नो होति. एकच्चे भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू पाचित्तियदिट्ठिनो होन्ति…पे… एकच्चे भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू पाटिदेसनीयदिट्ठिनो होन्ति… एकच्चे भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू दुक्कटदिट्ठिनो होन्ति… एकच्चे भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो होन्ति. ये ते, भिक्खवे, भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो, तेहि सो, भिक्खवे, भिक्खु एकमन्तं अपनेत्वा यथाधम्मं कारापेत्वा सङ्घं उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘‘यं खो सो, आवुसो, भिक्खु आपत्तिं आपन्नो, सास्स यथाधम्मं पटिकता. यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, सङ्घो पवारेय्या’’ति.
इध पन, भिक्खवे, भिक्खु तदहु पवारणाय पाचित्तियं अज्झापन्नो होति…पे… पाटिदेसनीयं अज्झापन्नो होति… दुक्कटं अज्झापन्नो होति… दुब्भासितं अज्झापन्नो होति. एकच्चे भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू सङ्घादिसेसदिट्ठिनो होन्ति. ये ते, भिक्खवे, भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो, तेहि सो, भिक्खवे, भिक्खु एकमन्तं अपनेत्वा यथाधम्मं कारापेत्वा सङ्घं उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘‘यं खो सो, आवुसो, भिक्खु आपत्तिं आपन्नो, सास्स यथाधम्मं पटिकता. यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, सङ्घो पवारेय्या’’ति.
इध पन, भिक्खवे, भिक्खु तदहु पवारणाय दुब्भासितं अज्झापन्नो होति. एकच्चे भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू थुल्लच्चयदिट्ठिनो होन्ति…पे… एकच्चे भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू पाचित्तियदिट्ठिनो होन्ति… एकच्चे भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू पाटिदेसनीयदिट्ठिनो होन्ति… एकच्चे भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो होन्ति, एकच्चे भिक्खू दुक्कटदिट्ठिनो होन्ति. ये ते, भिक्खवे, भिक्खू दुब्भासितदिट्ठिनो, तेहि सो, भिक्खवे, भिक्खु एकमन्तं अपनेत्वा यथाधम्मं कारापेत्वा सङ्घं उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘‘यं खो सो, आवुसो, भिक्खु आपत्तिं आपन्नो, सास्स यथाधम्मं पटिकता. यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, सङ्घो पवारेय्या’’ति.
थुल्लच्चयवत्थुकादि निट्ठिता.