६. तण्हक्खयसुत्तं

२०७. ‘‘यो, भिक्खवे, मग्गो या पटिपदा तण्हक्खयाय संवत्तति, तं मग्गं तं पटिपदं भावेथ. कतमो च, भिक्खवे, मग्गो कतमा च पटिपदा तण्हक्खयाय संवत्तति? यदिदं – सत्त बोज्झङ्गा. कतमे सत्त? सतिसम्बोज्झङ्गो…पे… उपेक्खासम्बोज्झङ्गो’’ति. एवं वुत्ते आयस्मा उदायी भगवन्तं एतदवोच – ‘‘कथं भाविता नु खो, भन्ते, सत्त बोज्झङ्गा, कथं बहुलीकता तण्हक्खयाय संवत्तन्ती’’ति?

‘‘इध, उदायि, भिक्खु सतिसम्बोज्झङ्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं विपुलं महग्गतं अप्पमाणं अब्यापज्जं [अब्यापज्झं (सी. स्या. पी.)]. तस्स सतिसम्बोज्झङ्गं भावयतो विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं विपुलं महग्गतं अप्पमाणं अब्यापज्जं तण्हा पहीयति. तण्हाय पहाना कम्मं पहीयति. कम्मस्स पहाना दुक्खं पहीयति…पे… उपेक्खासम्बोज्झङ्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं विपुलं महग्गतं अप्पमाणं अब्यापज्जं. तस्स उपेक्खासम्बोज्झङ्गं भावयतो विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं विपुलं महग्गतं अप्पमाणं अब्यापज्जं तण्हा पहीयति तण्हाय पहाना कम्मं पहीयति. कम्मस्स पहाना दुक्खं पहीयति. इति खो, उदायि, तण्हक्खया कम्मक्खयो, कम्मक्खया दुक्खक्खयो’’ति. छट्ठं.