६. समिद्धिलोकपञ्हासुत्तं

६८. ‘‘‘लोको, लोको’ति, भन्ते, वुच्चति. कित्तावता नु खो, भन्ते, लोको वा अस्स लोकपञ्ञत्ति वा’’ति? यत्थ खो, समिद्धि, अत्थि चक्खु, अत्थि रूपा, अत्थि चक्खुविञ्ञाणं, अत्थि चक्खुविञ्ञाणविञ्ञातब्बा धम्मा, अत्थि तत्थ लोको वा लोकपञ्ञत्ति वाति…पे… अत्थि जिव्हा…पे… अत्थि मनो, अत्थि धम्मा, अत्थि मनोविञ्ञाणं, अत्थि मनोविञ्ञाणविञ्ञातब्बा धम्मा, अत्थि तत्थ लोको वा लोकपञ्ञत्ति वा.

‘‘यत्थ च खो, समिद्धि, नत्थि चक्खु, नत्थि रूपा, नत्थि चक्खुविञ्ञाणं, नत्थि चक्खुविञ्ञाणविञ्ञातब्बा धम्मा, नत्थि तत्थ लोको वा लोकपञ्ञत्ति वा…पे… नत्थि जिव्हा…पे… नत्थि मनो, नत्थि धम्मा, नत्थि मनोविञ्ञाणं, नत्थि मनोविञ्ञाणविञ्ञातब्बा धम्मा, नत्थि तत्थ लोको वा लोकपञ्ञत्ति वा’’ति. छट्ठं.