२. खणसुत्तं

१३५. ‘‘लाभा वो, भिक्खवे, सुलद्धं वो, भिक्खवे, खणो वो पटिलद्धो ब्रह्मचरियवासाय. दिट्ठा मया, भिक्खवे, छफस्सायतनिका नाम निरया. तत्थ यं किञ्चि चक्खुना रूपं पस्सति अनिट्ठरूपंयेव पस्सति, नो इट्ठरूपं; अकन्तरूपंयेव पस्सति, नो कन्तरूपं; अमनापरूपंयेव पस्सति, नो मनापरूपं. यं किञ्चि सोतेन सद्दं सुणाति…पे… यं किञ्चि घानेन गन्धं घायति…पे… यं किञ्चि जिव्हाय रसं सायति…पे… यं किञ्चि कायेन फोट्ठब्बं फुसति…पे… यं किञ्चि मनसा धम्मं विजानाति अनिट्ठरूपंयेव विजानाति, नो इट्ठरूपं; अकन्तरूपंयेव विजानाति, नो कन्तरूपं; अमनापरूपंयेव विजानाति, नो मनापरूपं. लाभा वो, भिक्खवे, सुलद्धं वो, भिक्खवे, खणो वो पटिलद्धो ब्रह्मचरियवासाय. दिट्ठा मया, भिक्खवे, छफस्सायतनिका नाम सग्गा. तत्थ यं किञ्चि चक्खुना रूपं पस्सति इट्ठरूपंयेव पस्सति, नो अनिट्ठरूपं; कन्तरूपंयेव पस्सति, नो अकन्तरूपं; मनापरूपंयेव पस्सति, नो अमनापरूपं…पे… यं किञ्चि जिव्हाय रसं सायति…पे… यं किञ्चि मनसा धम्मं विजानाति इट्ठरूपंयेव विजानाति, नो अनिट्ठरूपं; कन्तरूपंयेव विजानाति, नो अकन्तरूपं; मनापरूपंयेव विजानाति, नो अमनापरूपं. लाभा वो, भिक्खवे, सुलद्धं वो, भिक्खवे, खणो वो पटिलद्धो ब्रह्मचरियवासाया’’ति. दुतियं.