३. गिरिमानन्दत्थेरगाथा

३२५. ‘‘वस्सति देवो यथा सुगीतं, छन्ना मे कुटिका सुखा निवाता;

तस्सं विहरामि वूपसन्तो, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव.

३२६. ‘‘वस्सति देवो यथा सुगीतं, छन्ना मे कुटिका सुखा निवाता;

तस्सं विहरामि सन्तचित्तो, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव.

३२७. ‘‘वस्सति देवो…पे… तस्सं विहरामि वीतरागो…पे….

३२८. ‘‘वस्सति देवो…पे… तस्सं विहरामि वीतदोसो…पे….

३२९. ‘‘वस्सति देवो…पे… तस्सं विहरामि वीतमोहो;

अथ चे पत्थयसी पवस्स देवा’’ति.

… गिरिमानन्दो थेरो….