२. धनियसुत्तं

१८. ‘‘पक्कोदनो दुद्धखीरोहमस्मि, (इति धनियो गोपो)

अनुतीरे महिया समानवासो;

छन्ना कुटि आहितो गिनि, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

१९. ‘‘अक्कोधनो विगतखिलोहमस्मि [विगतखीलोहमस्मि (सी. पी.)], (इति भगवा)

अनुतीरे महियेकरत्तिवासो;

विवटा कुटि निब्बुतो गिनि, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२०. ‘‘अन्धकमकसा न विज्जरे, (इति धनियो गोपो)

कच्छे रूळ्हतिणे चरन्ति गावो;

वुट्ठिम्पि सहेय्युमागतं, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२१. ‘‘बद्धासि भिसी सुसङ्खता, (इति भगवा)

तिण्णो पारगतो विनेय्य ओघं;

अत्थो भिसिया न विज्जति, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२२. ‘‘गोपी मम अस्सवा अलोला, (इति धनियो गोपो)

दीघरत्तं [दीघरत्त (क.)] संवासिया मनापा;

तस्सा न सुणामि किञ्चि पापं, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२३. ‘‘चित्तं मम अस्सवं विमुत्तं, (इति भगवा)

दीघरत्तं परिभावितं सुदन्तं;

पापं पन मे न विज्जति, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२४. ‘‘अत्तवेतनभतोहमस्मि, (इति धनियो गोपो)

पुत्ता च मे समानिया अरोगा;

तेसं न सुणामि किञ्चि पापं, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२५. ‘‘नाहं भतकोस्मि कस्सचि, (इति भगवा)

निब्बिट्ठेन चरामि सब्बलोके;

अत्थो भतिया न विज्जति, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२६. ‘‘अत्थि वसा अत्थि धेनुपा, (इति धनियो गोपो)

गोधरणियो पवेणियोपि अत्थि;

उसभोपि गवम्पतीध अत्थि, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२७. ‘‘नत्थि वसा नत्थि धेनुपा, (इति भगवा)

गोधरणियो पवेणियोपि नत्थि;

उसभोपि गवम्पतीध नत्थि, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२८. ‘‘खिला निखाता असम्पवेधी, (इति धनियो गोपो)

दामा मुञ्जमया नवा सुसण्ठाना;

न हि सक्खिन्ति धेनुपापि छेत्तुं [छेतुं (क.)], अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

२९. ‘‘उसभोरिव छेत्व [छेत्वा (स्या. क.)] बन्धनानि, (इति भगवा)

नागो पूतिलतंव दालयित्वा [पूतिलतं पदालयित्वा (स्या. क.)];

नाहं पुनुपेस्सं [पुन उपेस्सं (सी. स्या. कं. पी.), पुनुपेय्य (क.)] गब्भसेय्यं, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव’’.

३०. ‘‘निन्नञ्च थलञ्च पूरयन्तो, महामेघो पवस्सि तावदेव;

सुत्वा देवस्स वस्सतो, इममत्थं धनियो अभासथ.

३१. ‘‘लाभा वत नो अनप्पका, ये मयं भगवन्तं अद्दसाम;

सरणं तं उपेम चक्खुम, सत्था नो होहि तुवं महामुनि.

३२. ‘‘गोपी च अहञ्च अस्सवा, ब्रह्मचरियं [ब्रह्मचरिय (क.)] सुगते चरामसे;

जातिमरणस्स पारगू [पारगा (सी. स्या. कं. पी.)], दुक्खस्सन्तकरा भवामसे’’.

३३. ‘‘नन्दति पुत्तेहि पुत्तिमा, (इति मारो पापिमा)

गोमा [गोमिको (सी. पी.), गोपिको (स्या. कं.), गोपियो (क.)] गोहि तथेव नन्दति;

उपधी हि नरस्स नन्दना, न हि सो नन्दति यो निरूपधि’’.

३४. ‘‘सोचति पुत्तेहि पुत्तिमा, (इति भगवा)

गोपियो गोहि तथेव सोचति;

उपधी हि नरस्स सोचना, न हि सो सोचति यो निरूपधी’’ति.

धनियसुत्तं दुतियं निट्ठितं.