(१५६) १. निग्गहकथा
७४३. परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. परो परस्स चित्तं ‘‘मा रज्जि’’, ‘‘मा दुस्सि’’, ‘‘मा मुय्हि’’, ‘‘मा किलिस्सी’’ति निग्गण्हातीति? न हेवं वत्तब्बे…पे… परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. परो परस्स उप्पन्नो फस्सो ‘‘मा निरुज्झी’’ति निग्गण्हातीति? न हेवं वत्तब्बे…पे… परो परस्स उप्पन्ना वेदना…पे… उप्पन्ना सञ्ञा… उप्पन्ना चेतना… उप्पन्नं चित्तं… उप्पन्ना सद्धा… उप्पन्नं वीरियं … उप्पन्ना सति… उप्पन्नो समाधि…पे… उप्पन्ना पञ्ञा ‘‘मा निरुज्झी’’ति निग्गण्हातीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. परो परस्स अत्थाय रागं पजहति… दोसं पजहति…पे… अनोत्तप्पं पजहतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. परो परस्स अत्थाय मग्गं भावेति… सतिपट्ठानं भावेति…पे… बोज्झङ्गं भावेतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. परो परस्स अत्थाय दुक्खं परिजानाति, समुदयं पजहति, निरोधं सच्छिकरोति, मग्गं भावेतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. अञ्ञो अञ्ञस्स कारको, परङ्कतं सुखं दुक्खं अञ्ञो करोति अञ्ञो पटिसंवेदेतीति? न हेवं वत्तब्बे…पे….
परो परस्स चित्तं निग्गण्हातीति? आमन्ता. ननु वुत्तं भगवता –
‘‘अत्तनाव कतं पापं, अत्तना संकिलिस्सति;
अत्तना अकतं पापं, अत्तनाव विसुज्झति;
सुद्धि असुद्धि पच्चत्तं, नाञ्ञो अञ्ञं विसोधये’’ति [ध. प. १६५].
अत्थेव सुत्तन्तोति? आमन्ता. तेन हि न वत्तब्बं – ‘‘परो परस्स चित्तं निग्गण्हाती’’ति.
७४४. न वत्तब्बं – ‘‘परो परस्स चित्तं निग्गण्हाती’’ति? आमन्ता. ननु अत्थि बलप्पत्ता, अत्थि वसीभूताति? आमन्ता. हञ्चि अत्थि बलप्पत्ता, अत्थि वसीभूता, तेन वत रे वत्तब्बे – ‘‘परो परस्स चित्तं निग्गण्हाती’’ति.
निग्गहकथा निट्ठिता.