३. पठमसत्तकसुत्तं

२३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा राजगहे विहरति गिज्झकूटे पब्बते. तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘सत्त वो, भिक्खवे, अपरिहानिये धम्मे देसेस्सामि. तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति. ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं. भगवा एतदवोच –

‘‘कतमे च, भिक्खवे, सत्त अपरिहानिया धम्मा? यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू अभिण्हं सन्निपाता भविस्सन्ति सन्निपातबहुला; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू समग्गा सन्निपतिस्सन्ति, समग्गा वुट्ठहिस्सन्ति, समग्गा सङ्घकरणीयानि करिस्सन्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू अपञ्ञत्तं न पञ्ञापेस्सन्ति, पञ्ञत्तं न समुच्छिन्दिस्सन्ति, यथापञ्ञत्तेसु सिक्खापदेसु समादाय वत्तिस्सन्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू ये ते भिक्खू थेरा रत्तञ्ञू चिरपब्बजिता सङ्घपितरो सङ्घपरिणायका ते सक्करिस्सन्ति गरुं करिस्सन्ति मानेस्सन्ति पूजेस्सन्ति, तेसञ्च सोतब्बं मञ्ञिस्सन्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू उप्पन्नाय तण्हाय पोनोभविकाय न वसं गच्छिस्सन्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू आरञ्ञकेसु सेनासनेसु सापेक्खा भविस्सन्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, भिक्खू पच्चत्तञ्ञेव सतिं उपट्ठापेस्सन्ति – ‘किन्ति अनागता च पेसला सब्रह्मचारी आगच्छेय्युं, आगता च पेसला सब्रह्मचारी फासुं विहरेय्यु’न्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि.

‘‘यावकीवञ्च, भिक्खवे, इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु ठस्सन्ति, इमेसु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सिस्सन्ति; वुद्धियेव, भिक्खवे, भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानी’’ति. ततियं.