९. पठममच्छरियसुत्तं
२३९. ‘‘पञ्चहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो आवासिको भिक्खु यथाभतं निक्खित्तो एवं निरये. कतमेहि पञ्चहि? आवासमच्छरी होति; कुलमच्छरी होति; लाभमच्छरी होति; वण्णमच्छरी [धम्ममच्छरी (क.)] होति; सद्धादेय्यं विनिपातेति. इमेहि खो, भिक्खवे, पञ्चहि धम्मेहि समन्नागतो आवासिको भिक्खु यथाभतं निक्खित्तो एवं निरये.
‘‘पञ्चहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो आवासिको भिक्खु यथाभतं निक्खित्तो एवं सग्गे. कतमेहि पञ्चहि? न आवासमच्छरी होति; न कुलमच्छरी होति; न लाभमच्छरी होति; न वण्णमच्छरी होति; सद्धादेय्यं न विनिपातेति. इमेहि खो, भिक्खवे, पञ्चहि धम्मेहि समन्नागतो आवासिको भिक्खु यथाभतं निक्खित्तो एवं सग्गे’’ति. नवमं.