२७७. ओसारणानुजानना

४७४. अथ खो तस्स उक्खित्तकस्स भिक्खुनो धम्मञ्च विनयञ्च पच्चवेक्खन्तस्स एतदहोसि – ‘‘आपत्ति एसा, नेसा अनापत्ति. आपन्नोम्हि, नम्हि अनापन्नो. उक्खित्तोम्हि, नम्हि अनुक्खित्तो. धम्मिकेनम्हि कम्मेन उक्खित्तो अकुप्पेन ठानारहेना’’ति. अथ खो सो उक्खित्तको भिक्खु येन उक्खित्तानुवत्तका भिक्खू तेनुपसङ्कमि, उपसङ्कमित्वा उक्खित्तानुवत्तके भिक्खू एतदवोच – ‘‘आपत्ति एसा, आवुसो; नेसा अनापत्ति. आपन्नोम्हि, नम्हि अनापन्नो. उक्खित्तोम्हि, नम्हि अनुक्खित्तो. धम्मिकेनम्हि कम्मेन उक्खित्तो अकुप्पेन ठानारहेन. एथ मं आयस्मन्तो ओसारेथा’’ति. अथ खो ते उक्खित्तानुवत्तका भिक्खू तं उक्खित्तकं भिक्खुं आदाय येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु, उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु. एकमन्तं निसिन्ना खो ते भिक्खू भगवन्तं एतदवोचुं – ‘‘अयं, भन्ते, उक्खित्तको भिक्खु एवमाह – ‘आपत्ति एसा, आवुसो; नेसा अनापत्ति. आपन्नोम्हि, नम्हि अनापन्नो. उक्खित्तोम्हि, नम्हि अनुक्खित्तो. धम्मिकेनम्हि कम्मेन उक्खित्तो अकुप्पेन ठानारहेन. एथ मं आयस्मन्तो ओसारेथा’ति. कथं नु खो, भन्ते, पटिपज्जितब्ब’’न्ति? ‘‘आपत्ति एसा, भिक्खवे; नेसा अनापत्ति. आपन्नो एसो भिक्खु, नेसो भिक्खु अनापन्नो. उक्खित्तो एसो भिक्खु, नेसो भिक्खु अनुक्खित्तो. धम्मिकेन कम्मेन उक्खित्तो अकुप्पेन ठानारहेन. यतो च खो सो, भिक्खवे, भिक्खु आपन्नो च उक्खित्तो च पस्सति च, तेन हि, भिक्खवे, तं भिक्खुं ओसारेथा’’ति.

ओसारणानुजानना निट्ठिता.