२. विरद्धसुत्तं
८१४. ‘‘येसं केसञ्चि, भिक्खवे, चत्तारो इद्धिपादा विरद्धा, विरद्धो तेसं अरियो मग्गो सम्मा दुक्खक्खयगामी. येसं केसञ्चि, भिक्खवे, चत्तारो इद्धिपादा आरद्धा, आरद्धो तेसं अरियो मग्गो सम्मा दुक्खक्खयगामी. कतमे चत्तारो? इध, भिक्खवे, भिक्खु छन्दसमाधिप्पधानसङ्खारसमन्नागतं इद्धिपादं भावेति, वीरियसमाधि…पे… चित्तसमाधि…पे… वीमंसासमाधिप्पधानसङ्खारसमन्नागतं इद्धिपादं भावेति. येसं केसञ्चि, भिक्खवे, इमे चत्तारो इद्धिपादा विरद्धा, विरद्धो तेसं अरियो मग्गो सम्मा दुक्खक्खयगामी. येसं केसञ्चि, भिक्खवे, इमे चत्तारो इद्धिपादा आरद्धा, आरद्धो तेसं अरियो मग्गो सम्मा दुक्खक्खयगामी’’ति. दुतियं.