२. सतिसुत्तं
३६८. एकं समयं भगवा वेसालियं विहरति अम्बपालिवने. तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति. ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं. भगवा एतदवोच –
‘‘सतो, भिक्खवे, भिक्खु विहरेय्य सम्पजानो. अयं वो अम्हाकं अनुसासनी. कथञ्च, भिक्खवे, भिक्खु सतो होति? इध, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं; वेदनासु…पे… चित्ते…पे… धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं. एवं खो, भिक्खवे, भिक्खु सतो होति.
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, भिक्खु सम्पजानो होति? इध, भिक्खवे, भिक्खु अभिक्कन्ते पटिक्कन्ते सम्पजानकारी होति, आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होति, समिञ्जिते पसारिते सम्पजानकारी होति, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी होति, असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी होति, उच्चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी होति, गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी होति. एवं खो, भिक्खवे, भिक्खु सम्पजानकारी होति. सतो, भिक्खवे, भिक्खु विहरेय्य सम्पजानो. अयं वो अम्हाकं अनुसासनी’’ति. दुतियं.