२. चक्कवत्तिसुत्तं
२२३. ‘‘रञ्ञो, भिक्खवे, चक्कवत्तिस्स पातुभावा सत्तन्नं रतनानं पातुभावो होति. कतमेसं सत्तन्नं? चक्करतनस्स पातुभावो होति, हत्थिरतनस्स पातुभावो होति, अस्सरतनस्स पातुभावो होति, मणिरतनस्स पातुभावो होति, इत्थिरतनस्स पातुभावो होति, गहपतिरतनस्स पातुभावो होति, परिणायकरतनस्स पातुभावो होति. रञ्ञो, भिक्खवे, चक्कवत्तिस्स पातुभावा इमेसं सत्तन्नं रतनानं पातुभावो होति.
‘‘तथागतस्स, भिक्खवे, पातुभावा अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स सत्तन्नं बोज्झङ्गरतनानं पातुभावो होति. कतमेसं सत्तन्नं? सतिसम्बोज्झङ्गस्स रतनस्स पातुभावो होति…पे… उपेक्खासम्बोज्झङ्गस्स रतनस्स पातुभावो होति. तथागतस्स, भिक्खवे, पातुभावा अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स इमेसं सत्तन्नं बोज्झङ्गरतनानं पातुभावो होती’’ति. दुतियं.