३. ततियपुञ्ञाभिसन्दसुत्तं

१०२९. ‘‘चत्तारोमे, भिक्खवे, पुञ्ञाभिसन्दा कुसलाभिसन्दा सुखस्साहारा. कतमे चत्तारो? इध, भिक्खवे, अरियसावको बुद्धे अवेच्चप्पसादेन समन्नागतो होति – इतिपि सो भगवा…पे… सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवाति. अयं पठमो पुञ्ञाभिसन्दो कुसलाभिसन्दो सुखस्साहारो.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको धम्मे…पे… सङ्घे…पे….

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको पञ्ञवा होति उदयत्थगामिनिया पञ्ञाय समन्नागतो अरियाय निब्बेधिकाय सम्मा दुक्खक्खयगामिनिया. अयं चतुत्थो पुञ्ञाभिसन्दो कुसलाभिसन्दो सुखस्साहारो. इमे खो, भिक्खवे, चत्तारो पुञ्ञाभिसन्दा कुसलाभिसन्दा सुखस्साहारा’’ति. ततियं.