१. पठमपुञ्ञाभिसन्दसुत्तं
१०२७. सावत्थिनिदानं. ‘‘चत्तारोमे, भिक्खवे, पुञ्ञाभिसन्दा कुसलाभिसन्दा सुखस्साहारा. कतमे चत्तारो? इध, भिक्खवे, अरियसावको बुद्धे अवेच्चप्पसादेन समन्नागतो होति – इतिपि सो भगवा…पे… सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवाति. अयं पठमो पुञ्ञाभिसन्दो कुसलाभिसन्दो सुखस्साहारो.
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको धम्मे अवेच्चप्पसादेन समन्नागतो होति – स्वाक्खातो भगवता धम्मो…पे… पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहीति. अयं दुतियो पुञ्ञाभिसन्दो कुसलाभिसन्दो सुखस्साहारो.
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको सङ्घे अवेच्चप्पसादेन समन्नागतो होति – सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो…पे… अनुत्तरं पुञ्ञक्खेत्तं लोकस्साति. अयं ततियो पुञ्ञाभिसन्दो कुसलाभिसन्दो सुखस्साहारो.
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको अरियकन्तेहि सीलेहि समन्नागतो होति अखण्डेहि…पे… समाधिसंवत्तनिकेहि. अयं चतुत्थो पुञ्ञाभिसन्दो कुसलाभिसन्दो सुखस्साहारो. इमे खो, भिक्खवे, चत्तारो पुञ्ञाभिसन्दा कुसलाभिसन्दा सुखस्साहारा’’ति. पठमं.