३. अभिञ्ञापरिञ्ञापहानसुत्तं

२५. ‘‘सब्बं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहानाय वो, भिक्खवे, धम्मं देसेस्सामि. तं सुणाथ. कतमो च, भिक्खवे, सब्बं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहानाय धम्मो? चक्खुं, भिक्खवे, अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं, रूपा अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बा, चक्खुविञ्ञाणं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं, चक्खुसम्फस्सो अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बो, यम्पिदं चक्खुसम्फस्सपच्चया उप्पज्जति वेदयितं सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा तम्पि अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं…पे… जिव्हा अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बा, रसा अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बा, जिव्हाविञ्ञाणं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं, जिव्हासम्फस्सो अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बो, यम्पिदं जिव्हासम्फस्सपच्चया उप्पज्जति वेदयितं सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा तम्पि अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं. कायो अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बो… मनो अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बो, धम्मा अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बा, मनोविञ्ञाणं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं, मनोसम्फस्सो अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बो, यम्पिदं मनोसम्फस्सपच्चया उप्पज्जति वेदयितं सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा तम्पि अभिञ्ञा परिञ्ञा पहातब्बं. अयं खो, भिक्खवे, सब्बं अभिञ्ञा परिञ्ञा पहानाय धम्मो’’ति. ततियं.