३. नाळन्दसुत्तं
१२६. एकं समयं भगवा नाळन्दायं विहरति पावारिकम्बवने. अथ खो, उपालि गहपति, येन भगवा तेनुपसङ्कमि…पे… एकमन्तं निसिन्नो खो, उपालि गहपति, भगवन्तं एतदवोच – ‘‘को नु खो, भन्ते, हेतु, को पच्चयो येन मिधेकच्चे सत्ता दिट्ठेव धम्मे नो परिनिब्बायन्ति? को पन, भन्ते, हेतु, को पच्चयो येन मिधेकच्चे सत्ता दिट्ठेव धम्मे परिनिब्बायन्ती’’ति? (यथा पुरिमसुत्तन्तं, एवं वित्थारेतब्बं). अयं खो, गहपति, हेतु अयं पच्चयो येन मिधेकच्चे सत्ता दिट्ठेव धम्मे परिनिब्बायन्तीति. ततियं.