८. सिङ्गालसुत्तं
१६४. सावत्थियं विहरति…पे… ‘‘दारुणो, भिक्खवे, लाभसक्कारसिलोको…पे… अधिगमाय. अस्सुत्थ नो तुम्हे, भिक्खवे, रत्तिया पच्चूससमयं जरसिङ्गालस्स [सिङ्गालस्स (क.), जरसिगालस्स (सी. स्या. कं.)] वस्समानस्सा’’ति? ‘‘एवं, भन्ते’’. ‘‘एसो खो, भिक्खवे, जरसिङ्गालो उक्कण्डकेन [उक्कण्डकेन (सी.), उक्कण्णकेन (स्या. कं. पी.)] नाम रोगजातेन फुट्ठो नेव बिलगतो रमति, न रुक्खमूलगतो रमति, न अज्झोकासगतो रमति; येन येन गच्छति, यत्थ यत्थ तिट्ठति, यत्थ यत्थ निसीदति, यत्थ यत्थ निपज्जति; तत्थ तत्थ अनयब्यसनं आपज्जति. एवमेव खो, भिक्खवे, इधेकच्चो भिक्खु लाभसक्कारसिलोकेन अभिभूतो परियादिण्णचित्तो नेव सुञ्ञागारगतो रमति, न रुक्खमूलगतो रमति, न अज्झोकासगतो रमति; येन येन गच्छति, यत्थ यत्थ तिट्ठति, यत्थ यत्थ निसीदति, यत्थ यत्थ निपज्जति; तत्थ तत्थ अनयब्यसनं आपज्जति. एवं दारुणो खो, भिक्खवे, लाभसक्कारसिलोको…पे… एवञ्हि वो, भिक्खवे, सिक्खितब्ब’’न्ति. अट्ठमं.