१०. अनोत्तप्पमूलकसुत्तं
१०४. सावत्थियं विहरति…पे… ‘‘धातुसोव, भिक्खवे, सत्ता संसन्दन्ति समेन्ति. अनोत्तप्पिनो अनोत्तप्पीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; अप्पस्सुता अप्पस्सुतेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; दुप्पञ्ञा दुप्पञ्ञेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; ओत्तप्पिनो ओत्तप्पीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; बहुस्सुता बहुस्सुतेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; पञ्ञवन्तो पञ्ञवन्तेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति…पे…. (१)
‘‘अनोत्तप्पिनो अनोत्तप्पीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; कुसीता कुसीतेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; दुप्पञ्ञा दुप्पञ्ञेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; ओत्तप्पिनो ओत्तप्पीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; आरद्धवीरिया आरद्धवीरियेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; पञ्ञवन्तो पञ्ञवन्तेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति…पे…. (२)
‘‘अनोत्तप्पिनो अनोत्तप्पीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; मुट्ठस्सतिनो मुट्ठस्सतीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; दुप्पञ्ञा दुप्पञ्ञेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; ओत्तप्पिनो ओत्तप्पीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; उपट्ठितस्सतिनो उपट्ठितस्सतीहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्ति; पञ्ञवन्तो पञ्ञवन्तेहि सद्धिं संसन्दन्ति समेन्तीति…पे…. दसमं. (३)