८. तिम्बरुकसुत्तं

१८. सावत्थियं विहरति. अथ खो तिम्बरुको परिब्बाजको येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो तिम्बरुको परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच –

‘‘‘किं नु खो, भो गोतम, सयंकतं सुखदुक्ख’न्ति? ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति भगवा अवोच. ‘किं पन, भो गोतम, परंकतं सुखदुक्ख’न्ति? ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति भगवा अवोच. ‘किं नु खो, भो गोतम, सयंकतञ्च परंकतञ्च सुखदुक्ख’न्ति? ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति भगवा अवोच. ‘किं पन, भो गोतम, असयंकारं अपरंकारं अधिच्चसमुप्पन्नं सुखदुक्ख’न्ति? ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति भगवा अवोच. ‘किं नु खो, भो गोतम, नत्थि सुखदुक्ख’न्ति? ‘न खो, तिम्बरुक, नत्थि सुखदुक्खं; अत्थि खो, तिम्बरुक, सुखदुक्ख’न्ति. ‘तेन हि भवं गोतमो सुखदुक्खं न जानाति, न पस्सती’ति? ‘न ख्वाहं, तिम्बरुक, सुखदुक्खं न जानामि, न पस्सामि. जानामि ख्वाहं, तिम्बरुक, सुखदुक्खं; पस्सामि ख्वाहं, तिम्बरुक, सुखदुक्ख’’’न्ति.

‘‘‘किं नु खो, भो गोतम, सयंकतं सुखदुक्ख’न्ति इति पुट्ठो समानो ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति वदेसि. ‘किं पन, भो गोतम, परंकतं सुखदुक्ख’न्ति इति पुट्ठो समानो ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति वदेसि. ‘किं नु खो, भो गोतम, सयंकतञ्च परंकतञ्च सुखदुक्ख’न्ति इति पुट्ठो समानो ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति वदेसि. ‘किं पन, भो गोतम, असयंकारं अपरंकारं अधिच्चसमुप्पन्नं सुखदुक्ख’न्ति इति पुट्ठो समानो ‘मा हेवं, तिम्बरुका’ति वदेसि. ‘किं नु खो, भो गोतम, नत्थि सुखदुक्ख’न्ति इति पुट्ठो समानो ‘न खो, तिम्बरुक, नत्थि सुखदुक्खं; अत्थि खो, तिम्बरुक, सुखदुक्ख’न्ति वदेसि. ‘तेन हि भवं गोतमो सुखदुक्खं न जानाति, न पस्सती’ति इति पुट्ठो समानो ‘न ख्वाहं, तिम्बरुक, सुखदुक्खं न जानामि, न पस्सामि. जानामि ख्वाहं, तिम्बरुक, सुखदुक्खं; पस्सामि ख्वाहं, तिम्बरुक, सुखदुक्ख’न्ति वदेसि. आचिक्खतु च मे भवं गोतमो सुखदुक्खं. देसेतु च मे भवं गोतमो सुखदुक्ख’’न्ति.

‘‘‘सा वेदना, सो वेदयती’ति खो, तिम्बरुक, आदितो सतो ‘सयंकतं सुखदुक्ख’न्ति एवम्पाहं न वदामि. ‘अञ्ञा वेदना, अञ्ञो वेदयती’ति खो, तिम्बरुक, वेदनाभितुन्नस्स सतो ‘परंकतं सुखदुक्ख’न्ति एवम्पाहं न वदामि. एते ते, तिम्बरुक, उभो अन्ते अनुपगम्म मज्झेन तथागतो धम्मं देसेति – ‘अविज्जापच्चया सङ्खारा; सङ्खारपच्चया विञ्ञाणं…पे… एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स समुदयो होति. अविज्जाय त्वेव असेसविरागनिरोधा सङ्खारनिरोधो; सङ्खारनिरोधा विञ्ञाणनिरोधो…पे… एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधो होती’’’ति.

एवं वुत्ते, तिम्बरुको परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम…पे… एसाहं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति. अट्ठमं.