८. सप्पुरिससुत्तं
३८. ‘‘सप्पुरिसो, भिक्खवे, कुले जायमानो बहुनो जनस्स अत्थाय हिताय सुखाय होति – मातापितूनं अत्थाय हिताय सुखाय होति, पुत्तदारस्स अत्थाय हिताय सुखाय होति, दासकम्मकरपोरिसस्स अत्थाय हिताय सुखाय होति, मित्तामच्चानं अत्थाय हिताय सुखाय होति, पुब्बपेतानं अत्थाय हिताय सुखाय होति, रञ्ञो अत्थाय हिताय सुखाय होति, देवतानं अत्थाय हिताय सुखाय होति, समणब्राह्मणानं अत्थाय हिताय सुखाय होति.
‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, महामेघो सब्बसस्सानि सम्पादेन्तो बहुनो जनस्स अत्थाय हिताय सुखाय [हिताय…पे… (स्या. क.)] होति; एवमेवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो कुले जायमानो बहुनो जनस्स अत्थाय हिताय सुखाय होति – मातापितूनं अत्थाय हिताय सुखाय होति, पुत्तदारस्स अत्थाय हिताय सुखाय होति, दासकम्मकरपोरिसस्स अत्थाय हिताय सुखाय होति, मित्तामच्चानं अत्थाय हिताय सुखाय होति, पुब्बपेतानं अत्थाय हिताय सुखाय होति, रञ्ञो अत्थाय हिताय सुखाय होति, देवतानं अत्थाय हिताय सुखाय होति, समणब्राह्मणानं अत्थाय हिताय सुखाय होती’’ति.
‘‘बहूनं [बहुन्नं (सी. पी.)] वत अत्थाय, सप्पञ्ञो घरमावसं;
मातरं पितरं पुब्बे, रत्तिन्दिवमतन्दितो.
‘‘पूजेति सहधम्मेन, पुब्बेकतमनुस्सरं;
अनागारे पब्बजिते, अपचे ब्रह्मचारयो [ब्रह्मचारिनो (स्या.)].
‘‘निविट्ठसद्धो पूजेति, ञत्वा धम्मे च पेसलो [पेसले (क.)];
रञ्ञो हितो देवहितो, ञातीनं सखिनं हितो.
‘‘सब्बेसं [सब्बेसु (क.)] सो [स (स्या. पी. क.)] हितो होति, सद्धम्मे सुप्पतिट्ठितो;
विनेय्य मच्छेरमलं, स लोकं भजते सिव’’न्ति. अट्ठमं;