७. सत्तधम्मसुत्तं
६०. ‘‘सत्तहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु नचिरस्सेव आसवानं खया…पे… सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरेय्य. कतमेहि सत्तहि? इध, भिक्खवे, भिक्खु सद्धो होति, सीलवा होति, बहुस्सुतो होति, पटिसल्लीनो होति, आरद्धवीरियो होति, सतिमा होति, पञ्ञवा होति. इमेहि खो, भिक्खवे, सत्तहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु नचिरस्सेव आसवानं खया…पे… सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरेय्या’’ति. सत्तमं.