८. सारज्जसुत्तं
१५८. ‘‘पञ्चहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु सारज्जं ओक्कन्तो [ओक्कमन्तो (क.)] होति. कतमेहि पञ्चहि? इध, भिक्खवे, भिक्खु अस्सद्धो होति, दुस्सीलो होति, अप्पस्सुतो होति, कुसीतो होति, दुपञ्ञो होति. इमेहि खो, भिक्खवे, पञ्चहि, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु सारज्जं ओक्कन्तो होति.
‘‘पञ्चहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु विसारदो होति. कतमेहि पञ्चहि? इध, भिक्खवे, भिक्खु सद्धो होति, सीलवा होति, बहुस्सुतो होति, आरद्धवीरियो होति, पञ्ञवा होति. इमेहि खो, भिक्खवे, पञ्चहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु विसारदो होती’’ति. अट्ठमं.