६. ततियसद्धम्मसम्मोससुत्तं

१५६. [अ. नि. ४.१६०] ‘‘पञ्चिमे, भिक्खवे, धम्मा सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तन्ति. कतमे पञ्च? इध, भिक्खवे, भिक्खू दुग्गहितं सुत्तन्तं परियापुणन्ति दुन्निक्खित्तेहि पदब्यञ्जनेहि. दुन्निक्खित्तस्स, भिक्खवे, पदब्यञ्जनस्स अत्थोपि दुन्नयो होति. अयं, भिक्खवे, पठमो धम्मो सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खू दुब्बचा होन्ति, दोवचस्सकरणेहि धम्मेहि समन्नागता, अक्खमा अप्पदक्खिणग्गाहिनो अनुसासनिं. अयं, भिक्खवे, दुतियो धम्मो सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, ये ते भिक्खू बहुस्सुता आगतागमा धम्मधरा विनयधरा मातिकाधरा, ते न सक्कच्चं सुत्तन्तं परं वाचेन्ति; तेसं अच्चयेन छिन्नमूलको सुत्तन्तो होति अप्पटिसरणो. अयं, भिक्खवे, ततियो धम्मो सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, थेरा भिक्खू बाहुलिका होन्ति साथलिका ओक्कमने पुब्बङ्गमा पविवेके निक्खित्तधुरा, न वीरियं आरभन्ति अप्पत्तस्स पत्तिया अनधिगतस्स अधिगमाय असच्छिकतस्स सच्छिकिरियाय. तेसं पच्छिमा जनता दिट्ठानुगतिं आपज्जति. सापि होति बाहुलिका साथलिका ओक्कमने पुब्बङ्गमा पविवेके निक्खित्तधुरा, न वीरियं आरभति अप्पत्तस्स पत्तिया अनधिगतस्स अधिगमाय असच्छिकतस्स सच्छिकिरियाय. अयं, भिक्खवे, चतुत्थो धम्मो सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सङ्घो भिन्नो होति. सङ्घे खो पन, भिक्खवे, भिन्ने अञ्ञमञ्ञं अक्कोसा च होन्ति, अञ्ञमञ्ञं परिभासा च होन्ति, अञ्ञमञ्ञं परिक्खेपा च होन्ति, अञ्ञमञ्ञं परिच्चजना [परिच्चजा (स्या. कं.)] च होन्ति. तत्थ अप्पसन्ना चेव नप्पसीदन्ति, पसन्नानञ्च एकच्चानं अञ्ञथत्तं होति. अयं, भिक्खवे, पञ्चमो धम्मो सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तति. इमे खो, भिक्खवे, पञ्च धम्मा सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तन्ति.

‘‘पञ्चिमे, भिक्खवे, धम्मा सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तन्ति. कतमे पञ्च? इध, भिक्खवे, भिक्खू सुग्गहितं सुत्तन्तं परियापुणन्ति सुनिक्खित्तेहि पदब्यञ्जनेहि. सुनिक्खित्तस्स, भिक्खवे, पदब्यञ्जनस्स अत्थोपि सुनयो होति. अयं, भिक्खवे, पठमो धम्मो सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खू सुवचा होन्ति सोवचस्सकरणेहि धम्मेहि समन्नागता, खमा पदक्खिणग्गाहिनो अनुसासनिं. अयं, भिक्खवे, दुतियो धम्मो सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, ये ते भिक्खू बहुस्सुता आगतागमा धम्मधरा विनयधरा मातिकाधरा, ते सक्कच्चं सुत्तन्तं परं वाचेन्ति; तेसं अच्चयेन न छिन्नमूलको [अच्छिन्नमूलको (क.) अ. नि. ४.१६०] सुत्तन्तो होति सप्पटिसरणो. अयं, भिक्खवे, ततियो धम्मो सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, थेरा भिक्खू न बाहुलिका होन्ति न साथलिका, ओक्कमने निक्खित्तधुरा पविवेके पुब्बङ्गमा; वीरियं आरभन्ति अप्पत्तस्स पत्तिया अनधिगतस्स अधिगमाय असच्छिकतस्स सच्छिकिरियाय. तेसं पच्छिमा जनता दिट्ठानुगतिं आपज्जति. सापि होति न बाहुलिका न साथलिका, ओक्कमने निक्खित्तधुरा पविवेके पुब्बङ्गमा, वीरियं आरभति अप्पत्तस्स पत्तिया अनधिगतस्स अधिगमाय असच्छिकतस्स सच्छिकिरियाय. अयं, भिक्खवे, चतुत्थो धम्मो सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तति.

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सङ्घो समग्गो सम्मोदमानो अविवदमानो एकुद्देसो फासुं विहरति. सङ्घे खो पन, भिक्खवे, समग्गे न चेव अञ्ञमञ्ञं अक्कोसा होन्ति, न च अञ्ञमञ्ञं परिभासा होन्ति, न च अञ्ञमञ्ञं परिक्खेपा होन्ति, न च अञ्ञमञ्ञं परिच्चजना होन्ति. तत्थ अप्पसन्ना चेव पसीदन्ति, पसन्नानञ्च भिय्योभावो होति. अयं, भिक्खवे, पञ्चमो धम्मो सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तति. इमे खो, भिक्खवे, पञ्च धम्मा सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तन्ती’’ति. छट्ठं.