५. मच्छरिनीसुत्तं

११५. ‘‘पञ्चहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागता भिक्खुनी यथाभतं निक्खित्ता एवं निरये. कतमेहि पञ्चहि? आवासमच्छरिनी होति, कुलमच्छरिनी होति, लाभमच्छरिनी होति, वण्णमच्छरिनी होति, धम्ममच्छरिनी होति. इमेहि खो, भिक्खवे, पञ्चहि धम्मेहि समन्नागता भिक्खुनी यथाभतं निक्खित्ता एवं निरये.

‘‘पञ्चहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागता भिक्खुनी यथाभतं निक्खित्ता एवं सग्गे. कतमेहि पञ्चहि? न आवासमच्छरिनी होति, न कुलमच्छरिनी होति, न लाभमच्छरिनी होति, न वण्णमच्छरिनी होति, न धम्ममच्छरिनी होति. इमेहि खो, भिक्खवे, पञ्चहि धम्मेहि समन्नागता भिक्खुनी यथाभतं निक्खित्ता एवं सग्गे’’ति. पञ्चमं.