१. संखित्तसुत्तं

१. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति. ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं. भगवा एतदवोच –

‘‘पञ्चिमानि, भिक्खवे, सेखबलानि [सेक्खबलानि (क.)]. कतमानि पञ्च? सद्धाबलं, हिरीबलं [हिरिबलं (सी. पी.)], ओत्तप्पबलं, वीरियबलं [विरियबलं (सी. स्या. कं. पी.)], पञ्ञाबलं – इमानि खो, भिक्खवे, पञ्च सेखबलानि.

‘‘तस्मातिह, भिक्खवे, एवं सिक्खितब्बं – ‘सद्धाबलेन समन्नागता भविस्साम सेखबलेन, हिरीबलेन समन्नागता भविस्साम सेखबलेन, ओत्तप्पबलेन समन्नागता भविस्साम सेखबलेन, वीरियबलेन समन्नागता भविस्साम सेखबलेन, पञ्ञाबलेन समन्नागता भविस्साम सेखबलेना’ति. एवञ्हि वो, भिक्खवे, सिक्खितब्ब’’न्ति. इदमवोच भगवा. अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति. पठमं.