१. ञातसुत्तं

११. ‘‘तीहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो ञातो भिक्खु बहुजनअहिताय पटिपन्नो होति बहुजनदुक्खाय, बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सानं. कतमेहि तीहि? अननुलोमिके कायकम्मे समादपेति, अननुलोमिके वचीकम्मे समादपेति, अननुलोमिकेसु धम्मेसु समादपेति. इमेहि खो, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो ञातो भिक्खु बहुजनअहिताय पटिपन्नो होति बहुजनदुक्खाय, बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सानं.

‘‘तीहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो ञातो भिक्खु बहुजनहिताय पटिपन्नो होति बहुजनसुखाय, बहुनो जनस्स अत्थाय हिताय सुखाय देवमनुस्सानं. कतमेहि तीहि? अनुलोमिके कायकम्मे समादपेति, अनुलोमिके वचीकम्मे समादपेति, अनुलोमिकेसु धम्मेसु समादपेति. इमेहि खो, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो ञातो भिक्खु बहुजनहिताय पटिपन्नो होति बहुजनसुखाय, बहुनो जनस्स अत्थाय हिताय सुखाय देवमनुस्सान’’न्ति. पठमं.