१०. मोरनिवापसुत्तं
१०. एकं समयं भगवा राजगहे विहरति मोरनिवापे परिब्बाजकारामे. तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति. ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं. भगवा एतदवोच –
‘‘तीहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं. कतमेहि तीहि? असेखेन सीलक्खन्धेन, असेखेन समाधिक्खन्धेन, असेखेन पञ्ञाक्खन्धेन – इमेहि, खो, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं.
‘‘अपरेहिपि, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं. कतमेहि तीहि? इद्धिपाटिहारियेन, आदेसनापाटिहारियेन, अनुसासनीपाटिहारियेन – इमेहि खो, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति, अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं.
‘‘अपरेहिपि, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं. कतमेहि तीहि? सम्मादिट्ठिया, सम्माञाणेन, सम्माविमुत्तिया – इमेहि खो, भिक्खवे, तीहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं.
‘‘द्वीहि, भिक्खवे, धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं. कतमेहि द्वीहि? विज्जाय, चरणेन – इमेहि खो, भिक्खवे, द्वीहि धम्मेहि समन्नागतो भिक्खु अच्चन्तनिट्ठो होति अच्चन्तयोगक्खेमी अच्चन्तब्रह्मचारी अच्चन्तपरियोसानो सेट्ठो देवमनुस्सानं. ब्रह्मुना पेसा, भिक्खवे, सनङ्कुमारेन गाथा भासिता –
‘‘खत्तियो सेट्ठो जनेतस्मिं, ये गोत्तपटिसारिनो;
विज्जाचरणसम्पन्नो, सो सेट्ठो देवमानुसे’’ति [दी. नि. १.२७७; सं. नि. १.१८२; २.२४५].
‘‘सा खो पनेसा, भिक्खवे, सनङ्कुमारेन गाथा भासिता सुभासिता, नो दुब्भासिता; अत्थसंहिता, नो अनत्थसंहिता; अनुमता मया. अहम्पि, भिक्खवे, एवं वदामि –
‘‘खत्तियो सेट्ठो जनेतस्मिं, ये गोत्तपटिसारिनो;
विज्जाचरणसम्पन्नो, सो सेट्ठो देवमानुसे’’ति. दसमं;
निस्सयवग्गो [निस्सायवग्गो (स्या. कं.)] पठमो.